
बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण का असर अब नए चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। टॉक्सिओलॉजिकल साइंसेज में हाल में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि प्लास्टिक के सूक्ष्म कण अब माता के गर्भाशय तक पहुंच गए हैं। अध्ययन के अनुसार, शोधकर्ताओं ने 62 प्लेसेंटा (भ्रूण तक पोषण पहुंचाना वाला गर्भाशय का हिस्सा) नमूनों का अध्ययन किया। सभी 62 नमूनों में 6.5 से लेकर 790 माइक्रोग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक पाया गया।
अमरीकी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको हेल्थ साइंसेज ने चेताया
अमरीकी स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू मैक्सिको हेल्थ साइंसेज ने चेताया है कि प्लास्टिक की यह मात्रा कम लग सकती है, पर यह दो कारणों से चिंताजनक है। पहला, हमारे आसपास लगातार प्लास्टिक का प्रयोग बढ़ रहा है। ऐसे में इस प्रदूषण के आगे और बढ़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरा, प्लेसेंटा माता के गर्भ में आठ महीने के लिए ही बनता है।
इस आठ माह के अल्प समय में ही गर्भाशय के इस हिस्से तक प्लास्टिक के कणों का पहुंचना बताता है कि हमारे आस-पास किस कदर प्लास्टिक प्रदूषण पैर पसार चुका है। अध्ययन के प्रमुख लेखक मैथ्यू कैम्पेन के अनुसार, प्लेसेंटा में माइक्रो प्लास्टिक का मतलब है कि ग्रह पर मौजूद सभी स्तनधारी इस प्रदूषण की चपेट में हैं। मानव स्वास्थ्य के लिए यह अच्छे संकेत नहीं है।
इस तरह हुआ अध्ययन
अध्ययनकर्ताओं ने दान किए गए प्लेसेंटा ऊतकों का विश्लेषण किया। सैपोनिफिकेशन नामक प्रक्रिया में, उन्होंने नमूने का पहले केमिकल उपचार किया। फिर, उन्होंने प्रत्येक नमूने को एक अल्ट्रासेंट्रीफ्यूज में घुमाया, जिससे एक ट्यूब के नीचे प्लास्टिक की छोटे कण शेष रह गए। इसके बाद टीम ने पायरोलिसिस नामक तकनीक का इस्तेमाल किया। उन्होंने प्लास्टिक कणों को एक धातु के कप में 600 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया। इस दौरान गैस उत्सर्जन के रूप में अलग-अलग तापमान पर निकलने वाले भिन्न प्लास्टिक के कणों को जमा किया गया।
मिले 12 प्रकार के प्लास्टिक कण
प्लेसेंटा के ऊतकों में 12 प्रकार के प्लास्टिक कण मिले। सबसे अधिक पॉलिएथिलीन नामक पॉलीमर पाया गया। इसकी मौजूदगी 54% रही। यह प्लास्टिक के थैलियां और बोतलें बनाने के लिए उपयोग में आता है। इसके बाद, पॉलीविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) और नायलॉन के कणों की मौजूदगी 10%-10% रही। शेष में नौ अन्य पॉलिमर शामिल हैं।
बढ़ रहा कोलोन कैंसर, घट रहे शुक्राणु
शोध के प्रमुख लेखक मैथ्यू कैम्पेन के अनुसार, मानव ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी से संभवतः यह समझा जा सकता है कि क्यों हम 50 से कम उम्र के लोगों में कुछ खास रोग जैसे इन्फेलेमेटरी बाउल डिसीज, कोलोन कैंसर के साथ शुक्राणुओं के घटने की समस्या को बढ़ते देख रहे हैं। गौरतलब है कि माइक्रोप्लास्टिक 10 माइक्रोन आकार (0.01 मिलीमीटर) के सूक्ष्म कण होते हैं। यह इतने छोटे होते हैं कि आसानी से हमारी नसों में खून के प्रवाह के साथ प्रवेश कर सकते हैं। कोई हैरानी नहीं कि ये गर्भ में मौजूद शिशु तक पहुंच गए हों। पर हम इसका अध्ययन नहीं कर सके।
15 साल में दोगुना बढ़ रहा प्लास्टिक प्रदूषण
हर दस से 15 साल में प्लास्टिक प्रदूषण की मात्रा दोगुनी हो रही है। इसका आशय यह है कि अगर हम इसको आज रोक भी दें तो हमारे पीछे 2050 तक आज से तीन गुना प्लास्टिक होगा।
Published on:
25 Feb 2024 08:11 am
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