
दावोस 2026: डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी। फोटो: AI)
Global Economy: विश्व आर्थिक मंच (WEF) की 56वीं वार्षिक बैठक स्विट्जरलैंड के बर्फीले शहर दावोस में 19 जनवरी से शुरू होने के कारण आर्थिक जगत में हलचल मच गई है। इस बार का दावोस सम्मेलन (Davos 2026) पिछले कई दशकों में सबसे अलग है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) अपने भारी-भरकम प्रतिनिधिमंडल के साथ 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति को धार देने पहुंच रहे हैं, तो दूसरी तरफ भारत अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था (Indian Economy) और तकनीकी कौशल के साथ वैश्विक मंच पर अपनी दावेदारी पेश कर रहा है। दावोस 2026 का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु डोनाल्ड ट्रंप हैं। ट्रंप ने सत्ता संभालते ही दुनिया के कई देशों पर, विशेषकर यूरोपीय देशों पर आयात शुल्क की तलवार लटका दी है। ग्रीनलैंड मुद्दे पर यूरोपीय देशों के विरोध से नाराज ट्रंप ने इसे 'ग्लोबल बुलीइंग' (वैश्विक दादागिरी) के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। दावोस (WEF Summit) में इस बात पर बहस गर्म होगी कि क्या ट्रंप की ये नीतियां वैश्विक व्यापार को पूरी तरह ठप कर देंगी या फिर यह नए समीकरणों को जन्म देंगी।
इस साल दावोस में सिर्फ व्यापार ही नहीं, बल्कि तकनीक पर भी बड़ी चर्चा होगी। एआई (AI) की बढ़ती जरूरतों के लिए बिजली की भारी खपत एक नई चुनौती बन कर उभरी है। विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि एआई (AI) क्रांति जिंदा रखने के लिए दुनिया को एक बार फिर परमाणु ऊर्जा (Nuclear Energy) की ओर लौटना होगा। भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है, क्योंकि भारत अपनी स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को तेजी से बढ़ा रहा है।
भारत इस बार दावोस में केवल एक प्रतिभागी के रूप में नहीं, बल्कि एक समाधानकर्ता के रूप में मौजूद है।
चीन और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और ट्रंप की टैरिफ नीतियों के बीच दुनिया एक 'विश्वसनीय विकल्प' तलाश कर रही है। भारत अपनी 'मेक इन इंडिया' और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर खुद को सबसे सुरक्षित निवेश केंद्र के रूप में पेश कर रहा है।
जहां दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मंदी और मुद्रास्फीति से जूझ रही हैं, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था 7% की दर से बढ़ने का अनुमान जता रही है। दावोस में भारतीय डेलिगेशन वैश्विक निवेशकों को भारत की इस 'इकोनॉमिक रेजिलिएंस' की कहानी सुनाएगा।
दावोस 2026 इस बात का फैसला करेगा कि दुनिया 'प्रोटेक्शनिज्म' (संरक्षणवाद) की ओर जाएगी या फिर आपसी सहयोग की नई राह चुनेगी। भारत के लिए यह मंच अपनी वैश्विक छवि को 'विश्व गुरु' और 'आर्थिक शक्ति' के रूप में और मजबूत करने का सुनहरा मौका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का दावोस में होना एक 'प्रेशर टेस्ट' की तरह है। यदि वैश्विक नेता ट्रंप की शर्तों और टैरिफ की धमकियों के बीच कोई बीच का रास्ता नहीं निकालते हैं, तो वैश्विक शेयर बाजारों में भारी अस्थिरता देखी जा सकती है। वहीं, भारत का "न्यूट्रल और ग्रोथ ओरिएंटेड" स्टैंड उसे इस विवाद में एक मध्यस्थ के रूप में उभार सकता है।
भारतीय मंत्रियों की बैठक: पीयूष गोयल और अन्य भारतीय प्रतिनिधियों की वैश्विक सीईओ के साथ होने वाली 'वन-टू-वन' मीटिंग्स के नतीजों पर नजर रखनी होगी।
AI एग्रीमेंट: क्या AI के उपयोग को लेकर कोई वैश्विक नियम (Global Protocol) इस सम्मेलन में बनेगा?
बहरहाल, भले ही ग्रीनलैंड विवाद अमेरिका और यूरोप के बीच है, लेकिन इसका असर भारत पर भी पड़ सकता है। यदि यूरोप पर टैरिफ लगता है, तो यूरोपीय कंपनियां भारतीय बाजार में अपने उत्पादों की डंपिंग कर सकती हैं या फिर भारत से होने वाले निर्यात पर भी इसका घुमावदार असर पड़ सकता है। भारत को अपनी ट्रेड पॉलिसी में 'प्लान बी' तैयार रखने की जरूरत है।
Updated on:
18 Jan 2026 05:45 pm
Published on:
18 Jan 2026 05:44 pm
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