2 नवंबर 2026,

सोमवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

ग्रीनलैंड पर आर-पार: ट्रंप की ‘जबरदस्ती’ और यूरोप की ‘ना’, क्या शुरू होने वाला है व्यापारिक युद्ध ?

Geopolitics:डोनाल्ड ट्रंप ने डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने के लिए 8 यूरोपीय देशों पर भारी टैरिफ लगाने की घोषणा की है। इस फैसले से नाटो गठबंधन और वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़े संकट के संकेत मिल रहे हैं।
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

भारत

•

image

MI Zahir

•

Updated: 18 Jan 2026, 12:40 PM IST

Donald Trump

Donald Trump (Photo - Washington Post)

Negotiation: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच 'ग्रीनलैंड' को लेकर ठन गई है। यह विवाद अब केवल एक जमीन के टुकड़े को खरीदने तक (Greenland Purchase) सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और सैन्य गठबंधन (NATO) के लिए खतरा पैदा हो गया है। ट्रंप ने साफ कह दिया है कि अगर डेनमार्क (Denmark News) ने ग्रीनलैंड नहीं बेचा, तो वे यूरोप पर भारी व्यापारिक प्रतिबंध (Donald Trump Tariffs) लगाएंगे। डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि अमेरिका की सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड का उनके नियंत्रण में होना जरूरी है। उन्होंने इसे "द गोल्डन डोम" प्रोजेक्ट का हिस्सा बताया है, जो एक अभेद्य मिसाइल डिफेंस सिस्टम है। ट्रंप ने घोषणा की है कि यदि 1 फरवरी 2026 तक इस पर समझौता नहीं हुआ, तो डेनमार्क, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों से आने वाले सामान पर 10% टैरिफ लगेगा, जिसे जून तक 25% कर दिया जाएगा। यह एक तरह का 'इकोनॉमिक ब्लैकमेल' है जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है।

यूरोप का पलटवार: 'बिकाऊ नहीं है हमारी जमीन'

डेनमार्क की प्रधानमंत्री और ग्रीनलैंड की सरकार ने ट्रंप के इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि ग्रीनलैंड कोई व्यापारिक वस्तु नहीं है, बल्कि एक स्वायत्त क्षेत्र है। विरोध इतना अधिक बढ़ गया है कि फ्रांस और जर्मनी ने डेनमार्क की रक्षा के लिए अपने सैनिक ग्रीनलैंड भेजने का फैसला किया है। यह कदम सीधे तौर पर अमेरिका को चुनौती देने जैसा है।

बर्फ के नीचे छिपा है खजाना

आखिर ट्रंप की नजर ग्रीनलैंड पर क्यों मजी हुूई है? असल में ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड की बर्फ पिघल रही है, जिससे वहां दबे दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Elements), लिथियम और सोने के भंडार सामने आ रहे हैं। ये खनिज चिप मेकिंग और इलेक्ट्रिक कार उद्योग के लिए संजीवनी हैं। इसके अलावा, बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जो भविष्य के व्यापार पर कब्जा करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं।

इस मामले में किसने क्या कहा ?

डेनमार्क सरकार: "हम 21वीं सदी में रह रहे हैं, जहां देशों को खरीदा-बेचा नहीं जाता। यह लोकतंत्र का अपमान है।"

यूरोपीय संघ (EU): "हम व्यापार युद्ध के लिए तैयार हैं। यदि अमेरिका टैरिफ लगाता है, तो हम भी अमेरिकी उत्पादों पर प्रतिबंध लगाएंगे।"

चीन और रूस: इन दोनों देशों ने इस विवाद पर पैनी नजर रखी है, क्योंकि ग्रीनलैंड में अमेरिका की बढ़ती दिलचस्पी उनकी आर्कटिक रणनीति प्रभावित कर सकती है।

अब आगे क्या होगा?

अगले 15 दिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। 1 फरवरी की डेडलाइन नजदीक आ रही है। जानकारों का मानना है कि यदि ट्रंप पीछे नहीं हटते, तो वैश्विक शेयर बाजार बुरी तरह गिर सकते हैं। नाटो (NATO) गठबंधन में भी दरार पड़ सकती है, क्योंकि इसके सदस्य देश ही अब एक-दूसरे के खिलाफ सैन्य और आर्थिक मोर्चे पर खड़े हुए हैं।

जलवायु परिवर्तन का 'खौफनाक' सच

बहरहाल,इस पूरे राजनीतिक ड्रामे के बीच एक बड़ा पहलू 'पर्यावरण' का है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि ग्रीनलैंड की बर्फ का पिघलना पूरी दुनिया के तटीय शहरों (जैसे मुंबई, न्यूयॉर्क) को डुबो सकता है। नेता जमीन और खनिज के पीछे लड़ रहे हैं, जबकि असली संकट उस बर्फ का खत्म होना है जो पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित रखती है।