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Donald Trump के 15% Tariff पर भारतीय मूल के वकील का बड़ा हमला!

Tariff: सुप्रीम कोर्ट से करारा झटका लगने के बाद डोनाल्ड ट्रंप Donald Trump ने 15% ग्लोबल Tariff लागू कर दिया है। भारतीय-अमेरिकी वकील Neal Katyal ने इस कदम को असंवैधानिक बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की है।

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भारत

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MI Zahir

Feb 22, 2026

Donald Trump 15% Tariff

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारतीय-अमेरिकी वकील नील कत्याल। (फोटो: AI)

Constitution: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के नए व्यापारिक फैसलों ने एक बार फिर बड़ा कानूनी और राजनीतिक बवाल खड़ा कर दिया है। हाल ही में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के पुराने टैरिफ (Global Tariff) आदेशों को रद्द कर दिया था। इतनी बड़ी हार के बावजूद, ट्रंप प्रशासन ने अब 15% का नया ग्लोबल टैरिफ लगा दिया है। इस मनमाने फैसले पर भारतीय-अमेरिकी वकील नील कत्याल (Neal Katyal) ने कड़ी आपत्ति जताई है। कत्याल ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अगर ट्रंप को यह टैरिफ नीति सही और फायदेमंद लगती है, तो उन्हें अमेरिकी Constitution (संविधान) के तहत काम करते हुए कांग्रेस (संसद) की मंजूरी लेनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 6-3 के बहुमत से ट्रंप प्रशासन के उस फैसले को पलट दिया था, जिसमें उन्होंने 1977 के 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट' (IEEPA) का इस्तेमाल किया था। शीर्ष अदालत (US Supreme Court)ने साफ किया कि टैक्स लगाने का मुख्य अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है। इसी बड़ी जीत के तुरंत बाद ट्रंप ने 1974 के ट्रेड एक्ट के सेक्शन 122 का सहारा लिया। पहले उन्होंने 10% का ग्लोबल टैरिफ लगाया और फिर इसे बढ़ा कर 15% कर दिया। इसके साथ ही, ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को 'बेहद अमेरिकी विरोधी' करार दिया।

सुप्रीम कोर्ट में यह ऐतिहासिक मुकदमा जीता था (Trade Deficit)

नील कत्याल ने हाल ही में ट्रंप के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में यह ऐतिहासिक मुकदमा जीता था, उसने इस नए 15% टैरिफ के कानूनी आधार की धज्जियां उड़ा दी हैं। उनका कहना है कि व्यापार घाटे (Trade Deficit) और भुगतान संतुलन घाटे (Balance of payments deficit) में बहुत बड़ा अंतर होता है। कत्याल ने याद दिलाया कि खुद ट्रंप के न्याय विभाग (DOJ) ने पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में माना था कि सेक्शन 122 का इस्तेमाल व्यापार घाटे की स्थिति में नहीं किया जा सकता। ऐसे में अचानक इसी नियम को ढाल बनाकर 15% टैरिफ थोपना पूरी तरह से गैर-कानूनी है।

नए टैरिफ का भारत के निर्यात पर सीधा असर (Interim Agreement)

इस नए टैरिफ का सीधा असर भारत के निर्यात पर भी पड़ेगा। व्हाइट हाउस के एक अधिकारी के अनुसार, जब तक कोई नई व्यापार संधि या विशेष छूट लागू नहीं होती, तब तक भारत भी इस 15% ग्लोबल टैरिफ के दायरे में आएगा। यह ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका और भारत द्विपक्षीय व्यापार पर एक 'अंतरिम समझौते' (Interim Agreement) पर काम कर रहे हैं।

अल्पसंख्यक वकीलों के लिए एक अनोखा रिकॉर्ड कायम किया

शिकागो में भारतीय प्रवासी माता-पिता के घर जन्मे नील कत्याल अमेरिका के सबसे जाने-माने वकीलों में गिने जाते हैं। डार्टमाउथ कॉलेज और येल लॉ स्कूल से पढ़े कत्याल ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका के कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल की भूमिका भी निभाई है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में 50 से अधिक मामलों में जिरह कर के उन्होंने अल्पसंख्यक वकीलों के लिए एक अनोखा रिकॉर्ड कायम किया है।

कत्याल के तर्कों का पुरजोर समर्थन

नील कत्याल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि अगर राष्ट्रपति को इतने बड़े टैरिफ लगाने हैं, तो उन्हें अमेरिकी परंपरा के अनुसार कांग्रेस के पास जाना चाहिए। दूसरी तरफ, मशहूर अर्थशास्त्री और आईएमएफ (IMF) की पूर्व प्रथम उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने भी कत्याल के तर्कों का पुरजोर समर्थन किया है। गोपीनाथ ने भी स्पष्ट किया कि अर्थशास्त्र के नियमों के तहत 'ट्रेड डेफिसिट' और (Balance of payments deficit) को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।

आयात शुल्क कम करने के लिए समझौते पर मंथन चल रहा

अमेरिका और भारत के बीच व्यापार को लेकर चल रही बातचीत अब एक बेहद अहम मोड़ पर आ गई है। दोनों देशों के बीच कई प्रमुख उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने के लिए समझौते पर मंथन चल रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय कूटनीति इस 15% ग्लोबल टैरिफ के झटके से कैसे निपटती है और क्या अमेरिकी कांग्रेस राष्ट्रपति के इस फैसले के खिलाफ कोई नया प्रस्ताव लाती है या नहीं।

अधिकारों के लिए एक बड़ी संवैधानिक लड़ाई बनी

बहरहाल, इस पूरे विवाद का एक बड़ा पहलू अमेरिकी सत्ता और शक्तियों के संतुलन से जुड़ा है। यह केवल एक व्यापारिक या आर्थिक फैसला नहीं रह गया है, बल्कि अमेरिका में राष्ट्रपति की शक्तियों (Executive Powers) और संसद (Congress) के अधिकारों के बीच की एक बड़ी संवैधानिक लड़ाई बन गया है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला यह स्पष्ट संदेश देता है कि बिना कांग्रेस की सहमति के कोई भी राष्ट्रपति अपनी मर्जी से मनमाने टैक्स और नियम नहीं थोप सकता।