
ओपेक प्लस तेल निर्यात करने वाले 23 देशों का समूह है। यह समूह मिलकर यह तय करता है कि कितना तेल उत्पादन किया जाए और दुनिया के बाज़ार में कितना तेल बेचा जाए। ओपेक का गठन 1960 में हुआ था। दुनिया भर के कच्चे तेल का 30 फ़ीसदी हिस्सा ओपेक देशों से आता है। सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है, जो रोज़ाना एक करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है।
2016 में जब तेल की क़ीमत काफ़ी गिर गई, तो ओपेक ने तेल उत्पादन करने वाले 10 और देशों को इस समूह में शामिल किया, जिससे ओपेक प्लस का गठन हुआ। रूस भी ओपेक प्लस का हिस्सा बन गया। रूस भी रोज़ाना क़रीब एक करोड़ बैरल तेल का उत्पादन करता है। इस समूह में 13 देश बहुत अहम हैं, जो ज़्यादातर मध्यपूर्व और अफ़्रीकी देश हैं। ओपेक प्लस देश मिलकर दुनिया भर के कच्चे तेल का 40 फ़ीसदी उत्पादन करते हैं।
सऊदी अरब ने रूस के लिए जो किया है उसके कुछ नतीजे होंगे। मैं यह नहीं बताऊँगा कि मेरे मन में क्या है। लेकिन उसके नतीजे ज़रूर होंगे।
जो बाइडन
अमेरिकी राष्ट्रपति, CNN के इंटरव्यू में
सऊदी ने जो किया, उसका भुगतना तय: बाइडेन
तेल उत्पादक देशों के इसी फ़ैसले के बाद राष्ट्रपति बाइडन ने मंगलवार को समाचार चैनल सीएनएन को दिए इंटरव्यू में कहा कि सऊदी अरब के लिए इसके कुछ नतीजे होंगे। बाइडन के इंटरव्यू से ठीक एक दिन पहले सीनेट फ़ॉरेन रिलेशन्स कमेटी के चेयरमैन प्रभावशाली डेमोक्रेटिक सिनेटर बॉब मेनेन्डेज़ ने कहा था, "अमरीका को सऊदी अरब के साथ अपने सभी संबंधों को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर देना चाहिए।"
सीएनएन को दिए इंटरव्यू में बाइडन ने कहा, "उन्होंने (सऊदी अरब) रूस के लिए जो किया है, उसके कुछ नतीजे होंगे। मैं यह नहीं बताऊँगा कि मैं क्या सोच रहा हूँ और मेरे मन में क्या है। लेकिन उसके नतीजे ज़रूर होंगे।" दरअसल अमरीका ओपेक देशों के तेल उत्पादन को कम करने के फ़ैसले को रूस से जोड़कर देख रहा है। लेकिन सऊदी ने एक बयान जारी कर कहा है कि यह फ़ैसला तेल की क़ीमत को स्थिर करने के लिए किया गया है, क़ीमत बढ़ाने के लिए नहीं।
सऊदी अरब का अमरीका को जवाब
सऊदी अरब ने रूस का पक्ष लेने और अमरीका के ख़िलाफ़ राजनीति करने के आरोपों का खंडन किया है। सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने कहा, ''ओपेक प्लस के फ़ैसले के बाद सऊदी अरब को लेकर आए बयानों में कहा गया है कि सऊदी अरब अंतरराष्ट्रीय टकरावों में पक्ष ले रहा है और वो अमरीका के ख़िलाफ़ राजनीतिक रूप से प्रेरित है।''
''सऊदी अरब इन बयानों को पूरी तरह ख़ारिज करता है, जो तथ्य पर आधारित नहीं है और ओपेक प्लस के फ़ैसले को आर्थिक संदर्भ के इतर दिखाती हैं। ये फ़ैसला समूह के सभी सदस्य देशों ने सर्वसम्मति से किया है। ये फ़ैसला किसी एक देश का नहीं है। ये फ़ैसले आर्थिक आधार पर किए जाते हैं ताकि तेल बाज़ार में मांग और आपूर्ति का संतुलन बना रहे।''
बयान में कहा गया है, ''सऊदी सरकार ने अमरीकी प्रशासन से लगातार हो रही बातचीत में स्पष्ट किया था कि ओपेक प्लस के फ़ैसले को एक महीना टालने के नकारात्मक आर्थिक परिणाम होंगे। इस फ़ैसले को टालने का सुझाव दिया गया था। यूक्रेन संकट के संदर्भ में सऊदी अरब की स्थिति को लेकर तथ्यों से छेड़छाड़ करना दुर्भाग्यपूर्ण है और इससे सऊदी अरब की स्थिति नहीं बदलेगी। इसमें रूस-यूक्रेन संघर्ष में संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के समर्थन में मतदान करना भी शामिल है।''
वहीं, सऊदी अरब के विदेश मंत्री फ़ैसल बिन फ़रहान ने अल-अरबिया न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि तेल उत्पादन कम करने का फ़ैसला पूरी तरह से आर्थिक कारणों पर आधारित है।
रूस के दौरे पर हैं यूएई के राष्ट्रपति
वहीं यूएई के राष्ट्रपति शेख़ मोहम्मद बिन ज़ायेद अल-नहयान रूस के दौरे पर हैं। सेंट पीटर्सबर्ग में यूएई के राष्ट्रपति से मुलाक़ात के दौरान पुतिन ने कहा, "हमने यह फ़ैसला सप्लाई और माँग में संतुलन बनाए रखने के लिए किया है। हमारा फ़ैसला किसी एक देश के ख़िलाफ़ नहीं है।" इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा कि अमरीका अपने सांसदों और विदेशी सहयोगियों से विचार विमर्श कर सऊदी अरब से अपने संबंधों की 'समीक्षा' करेगा।
रूस के साथ सऊदी अरब
व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरीन-जीन-पियरी ने मंगलवार को कहा, "ये साफ़ नज़र आ रहा है कि ओपेक प्लस रूस के साथ है।" उन्होंने कहा कि वो विस्तार से बाद में बाताएँगी कि इससे अमरीका-सऊदी के रिश्तों पर क्या असर पड़ेगा।" अमरीका का सोचना है कि रूस अगर इससे कुछ कमाई कर लेगा तो उस पैसे का इस्तेमाल यूक्रेन के ख़िलाफ़ जारी जंग में करेगा। दूसरी तरफ़ अगर अमरीका में तेल की क़ीमत बढ़ती है, तो इसका सीधा असर नवंबर में अमरीका में होने वाले मिड टर्म चुनाव पर पड़ेगा।" अमरीका में अगले महीने आठ नवंबर को संसद, राज्य और गवर्नर के लिए चुनाव होंगे।
नवंबर में हैं अमरीका में बहुस्तरीय चुनाव
राष्ट्रपति बाइडन का चुनावी नतीजे से सीधा कोई संबंध नहीं है, लेकिन अगर रिपब्लिकन पार्टी सदन में अपना बहुमत हासिल कर लेती है तो इससे बाइडन को किसी भी बिल को पारित कराने में दिक़्क़त आ जाएगी। वो अपनी पार्टी के अंदर भी कमज़ोर हो जाएँगे और इसका सीधा असर 2024 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा।
Published on:
13 Oct 2022 03:57 pm
