
WHO
मध्य अफ्रीकी देश कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic Of Congo / DR Congo) और युगांडा (Uganda) में फैले इबोला (Ebola) प्रकोप को वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन - डब्लूएचओ (World Health Organization - WHO) ने 'ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी' घोषित किया है। इसकी सबसे बड़ी वजह इबोला का 'बुंडीबुग्यो' स्ट्रेन है। इसके अब तक 246 संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं, जबकि 88 लोगों की मौत हो चुकी है। संक्रमण कांगो के इटुरी प्रांत से शुरू हुआ, लेकिन इसके मामले पड़ोसी देश युगांडा तक पहुंच चुके हैं। यह इबोला वायरस का बेहद दुर्लभ प्रकार है, जिसके खिलाफ अभी तक कोई स्वीकृत वैक्सीन या विशेष इलाज उपलब्ध नहीं है। एक्सपर्ट्स को डर है कि संघर्षग्रस्त इलाकों में फैल रहा यह वायरस नियंत्रण से बाहर जा सकता है।
इबोला वायरस के चार प्रमुख स्ट्रेन इंसानों को संक्रमित करते हैं - जैरे, सूडान, बुंडीबुग्यो और ताई फॉरेस्ट। मौजूदा प्रकोप बुंडीबुग्यो स्ट्रेन से जुड़ा है। यह पहली बार 2007 में युगांडा में सामने आया था। इसके बाद 2012 में भी सीमित प्रकोप देखा गया। अब लगभग डेढ़ दशक बाद यह फिर बड़े स्तर पर लौटा है। यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खून, उल्टी, पसीने, लार और अन्य शारीरिक द्रव्यों के संपर्क से फैलता है। संक्रमित जानवरों से इंसानों में संक्रमण पहुंचने के बाद यह व्यक्ति-से-व्यक्ति तेज़ी से फैल सकता है, खासकर परिवार और स्वास्थ्यकर्मियों के बीच। इसके लक्षणों में तेज बुखार, कमजोरी, उल्टी, दस्त और आंतरिक-बाहरी रक्तस्राव शामिल हैं। इसकी मृत्यु दर करीब 50% मानी जाती है।
अब तक इस्तेमाल होने वाली प्रमुख इबोला वैक्सीन 'एर्वेबो' मुख्यतः जैरे स्ट्रेन के खिलाफ प्रभावी मानी जाती है, पर बुंडीबुग्यो स्ट्रेन पर यह कारगर नहीं है। यही वजह है कि डॉक्टरों के पास संक्रमण रोकने के सीमित साधन हैं। इस स्ट्रेन के लिए न कोई स्वीकृत वैक्सीन है और न ही लक्षित दवा।
एक्सपर्ट्स के अनुसार वायरस का फैलाव ऐसे इलाकों में हो रहा है, जहाँ हिंसा और अस्थिरता के कारण स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर हैं। कई बार अस्पताल और स्वास्थ्यकर्मी भी हमलों का निशाना बनते हैं। इससे संक्रमित लोग इलाज से बचते हैं और संक्रमण छिपा रह जाता है। डब्लूएचओ का मानना है कि वास्तविक संक्रमण रिपोर्ट किए गए मामलों की तुलना में कहीं अधिक हो सकता है। युगांडा तक संक्रमण पहुंचना इस बात का संकेत है कि सीमापार फैलाव शुरू हो चुका है। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि वैक्सीन न होने और पहचान में देरी के कारण वायरस कई हफ्तों तक बिना रोकथाम के उपाय किए फैलता चला गया, जिससे 'कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग' और नियंत्रण मुश्किल हो गया।
Published on:
19 May 2026 12:22 pm
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