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डॉक्टर्स डे: पहला कोरोना मरीज लाने के दौरान मन में बना था डर, जीवन बचाने के जज्बों में 24 घंटे लगातार की सेवा

लोगों को संक्रमण से बचाव और डर से बचाने रात के समय मरीजों को लाने बनती थी योजना

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Doctor's Day: Fear was formed during the first corona patient, 24 hour

डॉक्टर्स डे: पहला कोरोना मरीज लाने के दौरान मन में बना था डर, जीवन बचाने के जज्बों में 24 घंटे लगातार की सेवा

अनूपपुर। जिले में कोरोना संक्रमण से प्रभावित मरीजों की बचाने अपनी जीवन को दांव पर लगाकर दिनरात सेवा करने वाले डॉक्टरों ने कर्मवीर योद्धाओं की तरह कार्य किया, जहां दो माह के दौरान मिले २९ कोरोना पॉजिटिव व्यक्तियों को नया जीवन देकर उन्हें खुशी खुशी घर वापस विदा किया। सबसे हैरानी वाली बात तब सामने आई, जब पांच वर्षीय बालक में भी कोरोना पॉजिटिव की पुष्टि हुई। लेकिन डॉक्टरों के जज्बों ने उसे भी नया जीवन प्रदान कर गौरवांवित महसूस किया है। इनमें चिकित्सीय पदाधिकारियों के साथ साथ कर्मचारियों ने भी कोरोना पीडि़तों की सेवा में कंधा से कंधा मिलकर सहयोग दिया। जिसके कारण आज अनूपपुर जिला कोरोना मुक्त महसूस कर रहा है। इनमें डॉ. एसआरपी द्विवेदी, डॉ. विजयभान , डॉ. एनपी मांझी जैसे चिकित्सको का नाम अग्रणी माना जाता है। जिला अस्पताल में मरीजों की सेवा में जुटे ६८ वर्षीय डॉ. एसआरपी द्विवेदी ने डर के आगे जीत के फर्मूले पर काम किया। कोरोना में उम्र के लिहाज से संवेदनशील होने के बाद भी कोरोना मरीजों की कौंसलिंग करने, दवाईयां देने, और मोटिवेशन करने में जुटे रहे। लगातार मरीजों में१४ दिनों में कोरोना को मात देकर घर वापसी होने का ढाढस देते रहे। इसके लिए मरीजों को खाने, दवा लेने और नियमित व्यायाम के साथ अच्छी सोच के लिए प्रेरित किया। यहीं नहीं खुद को कोरोना संक्रमित मानते हुए घर के सदस्यों से दूरी बना ली। रात को घर वापसी करने पर परिजनों से दूर अपने कमरे में आइसोलेट भी रहे।
जबकि डॉ. विजयभान कोरोना संक्रमण के दौरान मरीजों को लाने और स्वस्थ्य होने पर उन्हें छोडऩे में कभी पीछे नहीं हटे। डॉ. भान बताते है कि जब जिले में कोरोना का पहला मरीज मिला और उसे लाने रात के समय जरियारी(जैतहरी) जा रहे थे तब उनके मन में कोरोना के प्रति भय बना हुआ था। अनेक सवाल उठ रहे थे। घर पर पत्नी और दो बच्चों की सुरक्षा का ख्याल बार बार आ रहा था। बावजूद चिकित्सीय कर्तव्य निभाने परिवार को अलग किया और रात १.३० बजे मरीज लेने जरियारी पहुंच गए। दो माह के दौरान उनके दोनों बच्चे अपनी मां से हमेशा यही कहते रहे कि पापा हमारे साथ नहीं रहते है। लेकिन मानवसेवा धर्म के सामने परिवार से दूरी बनाते हुए मरीजों की सेवा में अधिक समय दिया। वहीं डॉ. एनपी मांझी बताते हैं कि कोरोना संक्रमित मरीज जब अस्पताल पहुंचे थे तक भय तो अवश्य महसूस हुआ करता था, लेकिन मेरे लिए यह पहला मौका था जहां मुझे लगा कि मैं डॉक्टर हंू और इनकी जान बचाना ही मेरा कर्म है। उनकी २४ घंटे लगातार मॉनीटरिंग में डर खत्म हो गया। अस्पताल में लोगों को कोरोना मरीज देखकर भय या चिंता न बने। ऐसे मरीजों के सम्पर्क से अन्य लोगों को बचाने कोरोना मरीजों को हमेशा रात के समय ही लाने की रणनीति बनाई।
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