
चंद्र ग्रहण
आगरा। चंद्रग्रहण के सूतक शुरू हो चुके हैं। इस साल का सबसे बड़ा ग्रहण अब से कुछ ही देर में पड़ने वाला है। ये ग्रहण कुछ राशियों के लिए अच्छा प्रभाव डालेगा तो वहीं कुछ राशियों पर इसका असर नुकसानदायक पड़ रहा है। वहीं ग्रहण का प्रभाव कम करने के लिए तुलसी का पत्ता सबसे अधिक असरकारक है। पत्रिका टीम ने ज्योतिषाचार्य से बातचीत की और जाना कि ग्रहण के दौरान तुलसी का प्रभाव कैसा रहता है।
वैदिक सूत्रम के चेयरमैन भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि चंद्र ग्रहण के दौरान कई ऐसे उपाय होते हैं। जो ग्रहण के असर को कम करते हैं। ऐसा ही एक उपाय है तुलती का पत्ता। हिंदू धर्म में तुलसी को लेकर कई मान्यताएं हैं। अगर ग्रहण के दौरान तुलसी के पत्ते को लेकर कुछ उपाय किए जाए तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए वो लाभकारी होगा। ग्रहण के दौरान खाने-पीने की चीजों में तुलसी का पत्ता रख देने से उस पर ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ता। ग्रहण के दौरान सूतक शुरू होने से पहले लोगों को खाने-पीने की चीजों में खासकर अचार, मुरब्बा, दूध, दही और अन्य खाद्य पदार्थों में कुश तृण या तुलसी का पत्ता रख देना चाहिए। ऐसा करने से खाने की चीजों पर ग्रहण का प्रभाव नहीं पड़ेगा। पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि तुलसी के पत्तों में पारा होता है। इस पत्ते को खाने की चीजों में डालने से ग्रहण के दौरान निकलने वाली खतरनाक किरण पारा के ऊपर से गुजर जाती है और खाने की चीजों पर हानिकारक असर नहीं पड़ता है। इसलिए खाने में तुलसी का पत्ता रखने की परंपरा बरसों से चलती आ रही है।
तुलसी पत्ता रखने का धार्मिक कारण
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि वैदिक हिन्दू शास्त्रों के मुताबिक तुलसी में दोषों का नाश करने की शक्ति होती है। इसलिए तुलसी का पत्ता नकारात्मक प्रभाव को खत्म करने की क्षमता रखता है। लोग इसलिए तुलसी को अमृत के सामान मानते है। इसलिए ग्रहण के दौरान खाने की चीजों में तुलसी पत्ता रख देने से उसपर ग्रहण की हानिकारक किरणों का प्रभाव नहीं पड़ता है। इसलिए वैदिक हिन्दू ज्योतिष शास्त्र में तुलसी का खास महत्व है। किसी भी वस्तु को शुद्ध करने के लिए तुलसी का इस्तेमाल होता है। इस प्रकार तुलसी के पौधे से नकारात्मक उर्जा को खत्म करने में मदद करती है।
ग्रहण के बाद तुलसी के पत्ते रखे पानी से नहाए
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि ग्रहण के बाद तुलसी रखे पानी से घर के सभी लोगों को नहाना चाहिए। इससे परिवार की नकारात्मक उर्जा खत्म हो जाती है। इसके साथ ही घर में लक्ष्मी का निवास होता है। परिवार में सुख-संपत्ति और शांति का वास होता है।वैदिक शास्त्रों के अनुसार ये धार्मिक मान्यताएं है। वैदिक शास्त्रों में हमारे ऋषि मुनियों ने ग्रहण के समय भोजन करने के लिये मना किया है, क्योंकि उनकी मान्यता थी कि ग्रहण के समय वातावरण में घातक कीटाणु तेजी से फैल जाते हैं जो खाद्य वस्तु, जल आदि में एकत्रित होकर उसे दूषित कर देते हैं। इसलिये भोजन और जल के पात्रों में क़ुश अथवा तुलसी डालने को कहा है, ताकि सब कीटाणु उनमें एकत्रित हो जाएं और उन्हें ग्रहण के बाद फेंका जा सके।
वैज्ञानिक तर्क भी
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि पर्याप्त अनुसन्धान करके सिद्ध किया गया है कि ग्रहण के समय मनुष्य के पेट की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है। जिसके कारण इस समय किया गया भोजन अपच, अजीर्ण आदि शिकायतें पैदा कर शारीरिक या मानसिक हानि पहुंचा सकता है और इसके साथ ही दैवीय भागवत में कहा गया है कि ग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है। उतने वर्षों तक अरुतुन्द नामक नरक में दुःख भोगता है। फिर वह उदर रोग से पीड़ित मनुष्य होता है फिर काना, दंतहीन और अनेक रोगो से पीड़ित होता है। पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि ग्रहण के समय गायों को हरी घास, साग, पक्षियों को अन्न, चींटियों को भुना हुआ आटा, जरूरत मंदों को दान देने से अनेकों अनेक गुना पुण्य प्राप्त होता है।
Updated on:
28 Jul 2018 02:12 pm
Published on:
27 Jul 2018 04:02 pm
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