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यूपी में बड़ा मुद्दा है दलित की बारातः कासगंज में तिरंगा यात्रा के बाद अब ‘पनवारी कांड’ की आहट

उत्तर प्रदेश के कासगंज के गांव निजामपुर में ठीक वही घटनाक्रम है, जो 28 साल पहले दलितों की राजधानी कहे जाने वाले आगरा के गांव पनवारी में हुआ था।

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Marriage party

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डॉ. भानु प्रताप सिंह

आगरा। कासगंज में 26 जनवरी, 2018 को तिरंगा यात्रा निकाली गई थी। इसके बाद हुए दंगे में दो लोगों की मौत हो गई। राजनीतिक बयानबाजी ने इस मुद्दे को हवा दी। अब शांति है। कासगंज धीरे-धीरे पनवारी कांड की ओर बढ़ रहा है। कासगंज के गांव निजामपुर में ठीक वही घटनाक्रम है, जो 28 साल पहले आगरा के गांव पनवारी में हुआ था। अचरज यह है कि पुलिस की कार्यप्रणाली आग में घी का काम कर रही है।

निजामपुर में दलित की बारात न चढ़ने देने का ऐलान

सिकंदराराऊ-कासगंज रोड पर मोहनपुर पुलिस चौकी के अंतर्गत गांव है निजामपुर। ठाकुर बहुल है यह गांव। दलित भी रहते हैं। यहां की दलित बेटी शीतल की शादी 20 अप्रैल, 2018 को है। हाथरस के संजय से शादी तय हुई है। दोनों चाहते हैं कि बारात पूरे गांव में होकर निकाली जाए। इस बात की भनक ठाकुरों को लगी तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि गांव में बारात नहीं चढ़ाई जाएगी। उनका तर्क है कि आजादी के बाद से आज तक गांव में किसी दलित की बारात नहीं चढ़ाई गई है। संजय ने पुलिस अधीक्षक कासगंज से शिकायत की। पुलिस अधीक्षक ने रिपोर्ट मांगी। मोहनपुरा चौकी प्रभारी राजकुमार ने रिपोर्ट दी कि बारात चढ़ाई गई तो शांति भंग हो जाएगी। रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार गांव में कोई नई परंपरा डालने की अनुमति नहीं दी सकती है। फिलहाल पुलिस ने दोनों पक्षों के 22 लोगों को पाबंद कर दिया है। पुलिस क्षेत्राधिकारी डॉक्टर अजय कुमार सिंह भी यही कहते हैं कि परंपरा को बदला नहीं जाएगा।

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दलित बेटी की बारात को लेकर हुआ था पनवारी कांड

आज जो स्थिति निजामपुर में है, वही स्थिति आगरा में रुनकता के पास स्थिति गांव पनवारी में थी। पनवारी में जाट बहुसंख्य हैं। यहां की दलित बेटी मुंद्रा की शादी नगला पैमा में तय हुई थी। 21 जून, 1990 को नगला पैमा से बारात आनी थी। यहां भी जाटों ने ऐलान कर दिया कि बारात नहीं चढ़ाने दी जाएगी। बारात रोकने के लिए जाट अंदर ही अंदर तैयारी करने लगे। तत्कालीन जिलाधिकारी अमल कुमार वर्मा और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कर्मवीर सिंह तक यह सूचना पहुंची, लेकिन किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। जब इस मामले में कुछ नेता कूदे, तो प्रशासन ने ध्यान दिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पनवारी में हथियारबंद लोग एकत्रित हो गए थे। छतों पर मोर्चा जमा लिया था। भरतपुर से भी जाट आ गए थे। पुलिस-प्रशासन भी सक्रिय था। जैसे ही बारात निकलनी शुरू हुई, पथराव और फायरिंग शुरू हो गई। पुलिस कुछ न कर सकी। पुलिस वालों को अपनी जान बचाने की पड़ी थी। आरोप है कि दलित नेता रामभाई सोनकर को भट्ठे में जिन्दा जला दिया गया। उनका शव आज तक नहीं मिला है। चक्कीपाट निवासी दयाकिशन जरारी ने नेतागीरी की, लेकिन बाद में उनकी हत्या कर दी गई। सेना बुला ली गई, तब जाकर पनवारी में स्थिति नियंत्रण में आई। पनवारी कांड की प्रतिक्रिया पूरे आगरा में हुई। कर्फ्यू लगा दिया गया। जाट बहुल गांवों में दलितों के घर जलाए गए। उन्हें पीटा गया। दलितों ने आगरा शहर में मोर्चा लिया। पनवारी कांड के नायक के तौर पर चौधरी बाबूलाल का नाम उभरा। दलितों में उनके नाम का खौफ हो गया। आज वे फतेहपुर सीकरी से भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं। बसपा सरकार में रालोद की ओर से मंत्री भी रहे हैं।


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राजीव गांधी की घोषणा आज तक नहीं हुई पूरी

पनवारी कांड की गूंज पूरे देश में हुई। राजनेताओं का जमावड़ा आगरा में होने लगा। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी आगरा आए। वे स्वयं जिप्सी चलाते हुए अकोला गए, जहां से दलित पलायन कर गए थे। उन्होंने घोषणा की थी कि जिन दलितों के घर जलाए गए हैं, कांग्रेस उनके पक्के मकान बनाकर देगी। यह जिम्मेदारी कांग्रेस के तत्कालीन जिलाध्यक्ष आजाद कुमार कर्दम को दी गई। पक्के मकानों का क्या हुआ, कोई नहीं जानता है। मायावती , रामविलास पासवान , राजमोहन गांधी जैसे नेता भी आगरा आए। दलितों के पक्ष में खूब शोर मचाया। तब बदन सिंह विधायक थे और अजय सिंह सांसद थे। पुलिस के बहुत आग्रह पर चौधरी बाबूलाल ने समर्पण किया। उन्हें जेल भेज दिया गया। कुछ दिन बाद जमानत मिल गई। जेल से छूटकर वे सीधे संसदीय समिति के समक्ष प्रस्तुत हुए।

प्रशासन ने ध्यान न दिया तो खून-खराबा होना तय

पनवारी के घटनाक्रम को निकट से कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार राजीव सक्सेना बताते हैं कि अगर पुलिस-प्रशासन प्रारंभिक सूचनाओं पर ध्यान देता तो पनवारी कांड नहीं होता। पुलिस के सक्रिय होने तक बहुत देर हो चुकी थी। कासगंज के निजामपुर गांव भी पनवारी कांड को दोहराने की ओर बढ़ रहा है। प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो खून-खराबा होना तय है।

शर्मनाक है ये

जाटव उत्थान समिति के संयोजक देवकी नंदन सोन का कहना है कि पनवारी कांड के पीड़ित 168 लोग आज भी न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं। कई मर चुके हैं। बड़े दुख का विषय है कि पनवारी कांड के आरोपियों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। सब मौज कर रहे हैं। कासगंज के निजामपुर में पनवारी कांड दोहराने का ऐलान हो रहा है। स्वतंत्र भारत में इससे अधिक शर्मनाक कुछ नहीं हो सकता है कि दलित की बेटी की बारात को चढ़ने से रोका जाए। पनवारी कांड कराने वाले एक व्यक्ति को बतौर हीरो के तौर पर प्रस्तुत किया गया, जबकि उसकी जगह जेल में है। हम आशा करते हैं कि योगी आदित्यनाथ की सरकार उत्तर प्रदेश में एक और पनवारी कांड नहीं होने देगी।

कहां-कहां रोकी गई दलित की बारात

22 फरवरी, 2018 को मेरठ जिले के परतापुर क्षेत्र के कंचपुर घोपला गांव में भी दलित की बारात रोकी गई। इस पर दलित और जाटों में संघर्ष हो गया। जाट चाहते थे कि दलित की बारात दूसरे रास्ते से जाए।

फरवरी, 2018, आगरा के थाना मंसुखपुरा के गांव करकौली निवासी दलित कालीचरन की बेटी का रिश्ता दबंगों की धमकी के बाद टूट गया। थाना फरैरा के गांव झाड़े की गढ़ी से रिश्ता तय हुआ था। इससे पहले ही गांव के दबंग वहां पहुंच गए और धमकी दी अगर बारात लेकर आए तो जान से मार देंगे। इसके बाद रिश्ता टूट गया। पुलिस जांच कर रही है।

अप्रैल 2017 में ग्रेटर नोएडा जिले के गांव बिरोंडा में दलित की बारात में डीजे (डिस्क जॉकी) बजाने का सवर्णों ने विरोध किया। डीजे बंद न करने पर बारातियों पर हमला कर दिया गया था।

अप्रैल, 2016 में फिरोजाबाद के राजवली गांव की सगी बहनों की बारात को दबंगों ने नहीं चढ़ने दिया। पुलिस आ गई, लेकिन बैंडबाजा फिर भी नहीं बजा। दूल्हे को घोज़ी पर नहीं बैठने दिया गया।

जुलाई, 2016 में संभल जिले के भमरौली गांव में दलित की बारात पर हमला कर दिया।एक व्यक्ति की मौत हो गई।

17 मई, 2014 को आगरा के पिनाहट के गांव कुकथरी में भी दलित की बारात पर हमला किया गया। बारात मुरैना से आई थी। बारात में रंगशाला को लेकर आपत्ति की गई। फिर बारातियों की पिटाई कर दी। पुलिस ने इसे छेड़खानी का मामला बताया था।

26 मई, 2013 को अलीगढ़ के चंडौस के गांव सुदेशपुर की प्रधान मंदोदरी देवी जाटव की बारात को नहीं चढ़ने दिया गया था। गांव वालों का कहना था कि आज तक गांव में दलित की बारात नहीं चढ़ी है। सवर्णों के आगे अधिकारियों की एक न चली। 1989 में भी दलित की बारात को लेकर हंगामा हुआ था।

28 अप्रैल, 2012 को बदायूं जिले के सहसवान के सुल्तानपुर गांव में दलित के बेटी की बारात सवर्णों ने गांव में नहीं घूमने दी थी। उनके आगे पुलिस-प्रशासन भी बेबस हो गया था। यहां वाल्मीकि समाज के स्व. महेश वाल्मीकि के बेटी सुनीता की बारात चंदौसी के मई गांव से आई थी।

24 नवम्बर, 2012 को आगरा में भी ऐसी घटना हो चुकी है। रुनकता के रहने वाले जितेंद्र की बारात कोसीकलां (मथुरा) जानी थी। निकरौसी के दौरान दूल्हा घोड़ी पर चढ़कर जा रहा था। सवर्णों ने दलित दूल्हे को घोड़ी पर देखा तो रोक लिया और कहा कि घोड़ी पर चढ़कर नहीं जाओगे। दूल्हा नहीं माना तो उसकी और साथ चल रहे लोगों की पिटाई कर दी गई।

मार्च, 2009 में मथुरा के नौहझील के गांव लालपुर में भी घटना हुई थी। दबंगों ने दलित बेटी की बारात को चढ़ने से रोक दिया था। इसका विरोध किया तो दबंदों ने बारातियों की जमकर पिटाई की। मुजफ्फरनगर जिले के सोन्ता गांव में में दलितों की बारात पर सवर्णों ने इसलिए हमला कर दिया कि संगीत बज रहा था।