
सामान्यत: पूजा पाठ में अक्षत यानी चावल को विशेष महत्व दिया जाता है। पूजन के दौरान यदि पुष्प न हों तो अक्षत को पुष्प के रूप में भगवान को समर्पित कर दिया जाता है। यहां तक कि तमाम पूजन में भगवान को भोग के रूप में भी चावल की खीर बनाकर समर्पित की जाती है। लेकिन एकादशी पर अक्षत को लेकर विशेष नियम है। शास्त्रों में एकादशी के दिन चावल खाने की मनाही है। वहीं देवोत्थान एकादशी को तो सबसे बड़ी एकादशी माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु चार माह की निद्रा से जागते हैं। इस दिन तो भूलकर भी चावल नहीं खाना चाहिए। ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र से जानिए इसकी धार्मिक और वैज्ञानिक वजह।
ये है मान्यता
पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि मेधा ने एक बार अपनी माता के क्रोध से बचने के लिए अपनी देह त्याग दी थी। उनके शरीर का अंश भूमि में समा गया था। बाद में वही अंश चावल के रूप में भूमि से उत्पन्न हुआ। जब महर्षि की देह भूमि में समाई, उस दिन एकादशी का दिन था। तभी से ही यह परंपरा शुरू हो गई कि एकादशी के दिन चावल और चावल से बने भोज्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। इस दिन इन पदार्थों का सेवन महर्षि की देह के सेवन के समान माना जाता है।
ये है वैज्ञानिक कारण
दरअसल चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है। ज्योतिष शास्त्र की मानें तो जल तत्व की अधिकता मन को विचलित कर सकती है, क्योंकि जल और चंद्रमा में परस्पर आकर्षण होता है। इसलिए एकादशी के दिन चावल का अधिक सेवन करने से यदि शरीर में जल तत्व की मात्रा बढ़ेगी तो मन अशांत महसूस करेगा। चूंकि एकादशी व्रत, संयम और साधना का विशेष दिन माना जाता है, ऐसे में अशांत मन से व्यक्ति संयमित नहीं रह सकता। यदि संयमित नहीं रह पाएगा तो साधना भी एकाग्रता के साथ नहीं कर पाएगा। इसलिए प्रत्येक एकादशी को चावल खाने के लिए मना किया गया है।
इन चीजों से भी करें परहेज
एकादशी के दिन को लेकर कहा जाता है कि जो लोग इस दिन व्रत नहीं रख सकते हैं वे एकादशी का दिन सात्विक रूप से बिताएं। इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा, मदिरा आदि तामसिक चीजों से परहेज करें। इसके अलावा झगड़ा, क्लेश न करें। झूठ न बोलें।
Published on:
08 Nov 2019 11:35 am
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