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आगरा। भारत में डायबिटीज और क्षय रोग दोनों एक दूसरे के खतरे को बढ़ा रहे हैं। दोनों ही बीमारियों में प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है। जिससे डायबिटीज के रोगियों में क्षय रोग (टीबी) होने का खतरा 2-3 प्रतिशत और क्षय रोगियों में डायबिटीज होने का खतरा 4-5 प्रतिशत बढ़ जाता है। भारत में ऐसे मरीजों की संख्या 20-30 प्रतिशत है। भारत में इन दोनों ही रोगियों की संख्या अधिक है। डायबिटीज के 80 मिलियन (8 करोड़) व टीबी के 2.5 मिलियन (ढाई करोड़) मरीज हैं। डायबिटीज रोग के साथ यदि टीबी भी है तो डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए मरीज को गोलियां नहीं, इंसुलिन ही लेना पड़ेगा।
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क्षय रोग का परीक्षण कराते रहें
फतेहाबाद रोड स्थित केएनसीसी में एपीकॉन 2020 के तहत देश-विदेश के 12000 चिकित्सक जटिल रोगों पर मंथन कर रहे हैं। तीसरे दिन डायबिटीज और टीबी रोग के संबंध पर चर्चा हुई। उड़ीसा के डॉ. जयन्त पांडा ने अपने व्याख्या ने बताया कि विकसित देशों में डायबिटीज है, लेकिन वहां टीबी को कंट्रोल कर लिया गया है, जबकि भारत में दोनों ही बीमारियों के मरीजों की संख्या अधिक है। इसलिए क्षय रोग के मरीज को डायबिटीज और डायबिटीज के मरीज को क्षय रोग का परीक्षण समय-समय पर कराते रहना चाहिए। दोनों बीमारियों के साथ होने पर इन्हें कंट्रोल करने में भी मुश्किल होती है। डॉ. प्रभात अग्रवाल ने हाइपोथाइरायड कोमा विषय पर व्याख्यान देते हुए बताया कि दवा बीच में बंद करने की स्थिति में बीमारी जटिल हो जाती है। अक्सर सर्दी के मौसम में विशेषकर महिलाएं बेहोशी की हालत में डक्टरों के पास पहुंचती हैं। ऐसा बीच में दवा बंद करने के कारण होता है। भारत में हाइपोथॉयरायड मरीजों की संख्या लगभग 10-12 प्रतिशत है।
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Published on:
08 Jan 2020 06:56 pm
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