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एक अल्पसंख्यक योगगुरू ने तैयार की अनूठी योग गैलरी

बचपन में बीमारी ने सताया। योग करने पर समाज के लोगों ने विरोध किया। आज वहीं शख्स योग से लोगों को जोड़ रहा है।

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Amit Sharma

Jun 21, 2016

yoga gallery

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आगरा।
योग को धर्म विशेष के साथ जोड़कर देखने वालों को ईसाई समाज के फादर जॉन फरेरा ने करारा जवाब दिया है। योग से लगाव के कारण देश-विदेश में विरोध झेलने के बावजूद फादर जॉन फरेरा ने एक ऐसी योग गैलरी बनायी है, जो अपने आप में अनूठी है। वो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फिलीपींस आदि उन देशों में भी योग सिखाने गए, जहां कभी उनकी पहल का विरोध हुआ था। फिलहाल वो आगरा में योग और नेचुरोपैथी सेंटर चला रहे हैं। कई स्कूलों में भी योग शिक्षा दे रहे हैं।


बचपन में बीमार रहने पर सीखा योग

सेंट पीटर्स कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल फादर जॉन फरेरा बचपन में सेंट गुरुकुल, इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान अकसर बीमार रहते थे। वहीं उनके टीचर फादर भट्ट ने उन्हें योग अपनाने की सलाह दी। इससे स्वास्थ्य में सुधार हुआ तो उन्होंने आचार्य सत्यानंद सरस्वती से विधिवत योग शिक्षा ग्रहण की। स्वामी शिवानंद के ऋषिकेश आश्रम में भी रहे।


प्रधानाचार्य बनने के बाद बच्चों को सिखाते थे योग

उन्होंने बताया कि जब वो सेंट फ्लैक्स के प्रधानाचार्य तो बने तो बच्चों को प्रार्थना के दौरान योग के टिप्स देते थे। सेंट पीटर्स कॉलेज में छह साल के कार्यकाल में उन्होंने काफी काम किए। कॉलेज में बनवाई अनूठी योग गैलरी इनमें खास है। गैलरी में 60-65 प्रतिमाएं हैं, जिन्हें देखकर आसन सीखे जा सकते हैं। मकसद रिक्शा, ऑटो-वैन चालकों समेत कॉलेज आने वाले हर व्यक्ति में योग के प्रति रुचि पैदा करना है।


आगरा से रोम तक झेला विरोध

फादर फरेरा की योग यात्रा आसान नहीं थी। उन्हें सेंट पीटर्स स्कूल में उनकी पहल ईसाई समाज और अभिभावकों रास नहीं आई। जब उन्होंने योग पर कार्यों के बारे में फेसबुक पर लिखना शुरू किया तो कई रोम, अमेरिका और आस्ट्रेलिया तक के ईसाई उनके विरोध में खड़े हो गए, लेकिन तब भी ऐसे भी लोग थे जिन्होंने उनकी पहल को सराहा। दरअसल, विरोध करने वाले योग को धर्म विशेष से जोड़कर देख रहे थे। फादर फरेरा ने खुशी जताई कि लोगों को समझ आई और 21 जून को पूरी दुनिया योग करेगी।


योग है धर्मपालन में मददगार

फादर फरेरा कहते हैं, ‘जो योग को जान लेगा वह विरोध नहीं कर सकता। योग इंसान को खुद के अंदर झांकने की दृष्टि देता है। पहले व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है और फिर अपने ईष्ट से। उसका ईष्ट चाहे जो हो। यानी योग धर्मपालन की राह में बाधा नहीं, बल्कि मददगार है।’


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