
diwali
आगरा। ताजमहल के शहर में साहित्यकार और कवि भी दीवाली मना रहे हैं। शब्दों के खेल में हर किसी को उलझा रहे हैं। अपनी कल्पनाओं से दीपावली का महत्व बता रहे हैं। कुछ प्रेम में पगे शब्दों को ला रहे हैं तो कुछ दीपक की कहानी सुना रहे हैं। हर कविता के केन्द्र में दीप है, जो अंधकार को मिटाता है, उजियारा फैलाता है। डॉ. रुचि चतुर्वेदी कहती हैं- मैं निभाती रही प्रेम को उम्रभर तुम निभाओ तो दीपावली हो मेरी। सर्वज्ञ शेखर गुप्त कामना कर रहे हैं कि अँधेरा धरा से दूर भागेगा। भरत दीप ने अनोखी मनुहार की है। नीरज मीत ने कहा है कि मन का दीप जलाओ। गीता यादवेन्दु की बात सुनिए- प्रेम की रौशनी भर दूँ दिलों में। पम्मी सडाना की कामना है- इस दीवाली तुम आ जाते। हरविन्दर पाल सिंह ने क्या खूब लिखा है- घर-घर दीपक जले खुशी का, दुआ करो हो भला सभी का। ललिता कर्मचंदानी की कामना है- आओ आज हम प्रेम की दीपावली मनायें। डॉ. अमी आधार निडर लिखते हैं- दीप जलेंगे आंगन-आंगन। यहां पढ़िए सभी कविताएं।
दीपों का त्योहार
जीवन में आनन्द हो,खुशियाँ मिलें अपार।
बहुत मुबारक़ आपको , दीपों का त्योहार।
ज्योतिर्मय इस पर्व पर, प्रभु से है अरदास,
पाप-अधम का नाश हो,बढ़े परस्पर प्यार।
चायनीज़ झालर नहीं , हों माटी के दीप,
रोज़गार की आस में , देखे राह कुम्हार।
सिर्फ पटाख़ो पर नहीं , करिए मुद्रा व्यर्थ,
निर्धन का घर कीजिए,ख़ुशियों से गुलज़ार।
केवल पूजन से नहीं, आज चलेगा काम,
पुरुषोत्तम श्रीराम को , कीजे अंगीकार।
पर्व सफल हो जाएगा, कर लें यदि मंज़ूर,
दीपोत्सव पर “दीप” की, इतनी सी मनुहार।
-भरत दीप
तुम निभाओ तो दीपावली हो मेरी
प्रेम दीपक हृदय द्वार पर रख रही तुम जो आओ तो दीपावली हो मेरी,
मैं निभाती रही प्रेम को उम्रभर तुम निभाओ तो दीपावली हो मेरी
द्वार मन के मैं सतिये लगाती रही टाँगती हूँ प्रतीक्षा की झालर नयी,
नैन कजरा रंगोली बनाता रहा आँसुओं ने भरी फिर से गागर नयी ।
नेह के दीप घृत से भरे सैकड़ों तुम जलाओ तो दीपावली हो मेरी ।
मैं निभाती रही प्रेम को उम्रभर तुम निभाओ तो दीपावली हो मेरी
धन की तेरस मनाओ मगर साजना मन की चौदस तो मन की प्रतीक्षा करें ।
भाव का हर कलावा कलाई बँधा नैन बस दो नयन की प्रतीक्षा करें ।
प्रीत का गीत मैं गा रही आप भी गुनगुनाओ तो दीपावली हो मेरी ।
मैं निभाती रही प्रेम को उम्रभर तुम निभाओ तो दीपावली हो मेरी
झिलमिलाता है मन प्रीत की ज्योति में तुम जो आओ अमावस सजे ये विनत ।
धैर्य की चकरियाँ चल पड़ीं ज़ोर से फुलझड़ीं धड़ कनों की चलीं अनवरत ।।
घर की लक्ष्मी खड़ी देहरी दीप ले घर सजाओ तो दीपावली हो मेरी ।।
मैं निभाती रही प्रेम को उम्रभर तुम निभाओ तो दीपावली हो मेरी
-डॉ. रुचि चतुर्वेदी
नन्हा दीपक
घना अँधेरा रात अमावस
कुछ ना सूझे मुझको
मद्धम मद्धम लौ दीपक की
दूर न दिखता मुझको
मंजिल पर जाना है
अंधकार से भय है
नन्हा सा दीपक है
अंधकार भयावह है
चला वहाँ तक
जहाँ तक रोशनी
आगे का पथ हुआ उजियारा
बढ़ता जाता रोशन होता पथ
मंजिल निकट में पाता
नन्हे से दीपक ने मुझको
राह वो दिखलाई
अंधकार को चीर के मैंने
मंजिल अपनी पाई
मन के अँधियारों में घिर जाओ
आशा का दीप जलाओ
कुछ ना सूझे कुछ ना दीखे
दो डग तो बढ़ाओ
नए रास्ते सूझेंगे
मंजिल तक भी जाओगे
मन का दीप जला लो मद्धम
रोशन पथ तुम पाओगे
-नीरज 'मीत'
इस दीवाली
इस दीवाली दिये
जलाऊँ खुशियों के
प्रेम की रौशनी
भर दूँ दिलों में।
नफरतों के उफन रहे
सैलाब ख़त्म कर दूँ
रिश्तों में प्रेम ही प्रेम
लबालब भर दूँ ।
भूख और गरीबी
दूर कर दूँ और
सबकी ज़िन्दगियाँ
रौशनी से भर दूँ ।
रात सा भर गया है
निराशा का अँधेरा
दिलों में गहरे तक
उसे दफ़न कर दूँ
गहरे तले में कहीं ।
आशाओं और खुशियों की
झालरें लटका दूँ
रूठे हुओं को मना लूँ
रोते हुओं को हँसा दूँ ।
सबकी ज़िन्दगियाँ
खुशियों के फूलों
से महका दूँ
इस दीवाली ।
-गीता यादवेन्दु
अये अंधेरे भाग धरा से
धनतेरस दीवाली गोवर्धन
भाई दूज की बह रही बहार
पर्व अनुष्ठानों का मौसम
धूमधाम है अपरम्पार,
गरीबों उपेक्षितों वंचितों पर
त्योहारों पर रखना दयाभाव
हे प्रभु, सुख शांति मय हो
राष्ट्र में सर्वधर्म समभाव
अये अंधेरे भाग धरा से
शुभ दीवाली आई है
झिलमिल झिलमिल दीप जले
शुभ्र ज्योत्स्ना छाई है
नमो नमो दीपमालिके
करो दूर अज्ञान अंधेरा
दरिद्रता की निशा अंत हो
सौभाग्य का नवल सवेरा
ऋद्धि सिद्धि हों हर घर आंगन
चहुँ ओर हो खुशहाली
रोते चेहरे खिल खिल जाएं
ऐसी हो इस बार दिवाली
-सर्वज्ञ शेखर गुप्त
इस दीवाली तुम आ जाते......
घर तब आलोकित होता
दीपक एक मैं जलाती
उर में भी उजाला होता
दूसरा जब तुम जलाते
कदाचित,
इस दीवाली तुम आ जाते.
बरसों की बात:
दिल रहा अँधेरा
अमावस की रात
जल रहा सवेरा
आती रही दीवाली
पर हृदय तो रहा
खाली का खाली,
संताप किए रहा बसेरा
रोता ही रहा जिया मेरा
हँस पड़ता तब यह भी
तुम जब सामने मुस्कुराते
उत्साहित हो जाता आयुष्य
हौले से तुम यहीं गुनगुनाते
छम से बस तुम आ जाते;
चिरागों की लौ में देखा
पटाखों की रौ में ढूँढा:
एक पुकार तुम्हारी जो
कहीं से आ जाती
वियोगी मेरे जी में
फुलझड़ी-सी चल जाती
अँधियारे को हिय के
उज्जवल कुछ कर जाती,
एकाकी पसरा आँगन
खुशियों से भर जाता
सदियों से बिखरा दामन
एक पल में सँवर जाता
मन के सूने दर्पण में
प्रतिबिम्ब जब तुम्हारा उतर आता
अंतर तक मेरा दीपावली मनाता
जो बेचारा न जाने कब से -
अभिलाषाओं के दीप जला बैठा रहा
हर साल, हर पल यही राह ताकता रहा
कि काश, एक दीवाली तुम आ जाते !
- पम्मी सडाना
एक शुभ परिकल्पना
घर-घर दीपक जले खुशी का,
दुआ करो हो भला सभी का,
मन की द्वेष भावना का तम,
दुर्घटना, हिंसा जाऐं थम,
सदाशयता हो प्रचलन में,
हो कल्याण सदा धरती का।
मिटे दूर बदहाली हो अब,
बैर भाव घट खाली हो अब,
समृद्धि, खुशहाली हो अब,
हर घर रोशन दीप हो घी का।
इस धरती से मिटे प्रदूषण,
पर्यावरण का शुद्ध हो कण कण,
तोरणद्वार सजे हर प्राँगण,
मिट जाऐ हर त्रास बदी का।
-हरविंदर पाल सिंह
प्रेम की दीपावली मनायें
मन में जले दीपक इक शान्ति का ,
तो सुख का प्रकाश फैले .
देहरी पे जले दीपक इक दान का
तो सामर्थ्य का प्रकाश फैले.
आँगन में जले दीपक इक करम का
को समृद्धि का प्रकाश फैले .
जीवन मे जले दीपक इक कर्तव्य का
तो आस्था का प्रकाश फैले .
ह्रदय मे जले दीपक इक प्रेम का
तो विश्व सौहार्द का प्रकाश फैले,
ये सारे दीपक जलाकर अवलि सजायें,
आओ आज हम प्रेम की दीपावली मनायें .
-ललिता कर्मचन्दानी
दीप जलेंगे आँगन आँगन
दीप जलेंगे आँगन आँगन।
होगा सारे जग में चांदन।
सुख समृद्धि निरोगी काया।
ऐसा हो जीवन मनभावन। ।
-डॉ. अमी आधार निडर
Published on:
06 Nov 2018 12:44 pm
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