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पढ़ें, काका हाथरसी के हास्य दोहे और कविताएं

काका हाथरसी का वो व्यंग्यात्मक संग्रह जो आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देगा।

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आगरा

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suchita mishra

Sep 18, 2017

Kaka Hathrasi

Kaka Hathrasi

बचपन से ही रोते हुए को हंसाने में माहिर काका हाथरसी ने अपने पूरे जीवन इसी विधा को समर्पित कर दिया। वे हमेशा लोगों को हंसते हुए देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अपनी ज्यादातर रचनाओं में हास्य के मोती पिरोए। संयोग की बात है कि आज काका का जन्मदिवस भी है और पुण्यतिथि भी। काका का 18 सितंबर 1906 में जन्म हुआ था और इसी दिनांक यानी 18 सितंबर 1995 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा। इस मौके पर काका हाथरसी को याद करते हुए प्रस्तुत हैं उनकी कुछ हास्य रचनाएं।

1. अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद,
देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंद

2. अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,
मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट

3. अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख,
ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख

4. काका हाथरसी के हास्य दोहे
अंग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,
ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अंगरेज

5. मेरी भाव बाधा हरो, पूज्य बिहारीलाल
दोहा बनकर सामने, दर्शन दो तत्काल

6. अगर फूल के साथ में, लगे न होते शूल
बिना बात ही छेड़ते, उनको नामाक़ूल

7. अगर चुनावी वायदे, पूर्ण करे सरकार
इंतज़ार के मजे सब, हो जाएं बेकार

8. अंधा प्रेमी अक्ल से, काम नहीं कुछ लेय
प्रेम-नशे में गधी भी, परी दिखाई देय

कविता संग्रह

1. पुलिस-महिमा

पड़ा-पड़ा क्या कर रहा, रे मूरख नादान
दर्पण रख कर सामने, निज स्वरूप पहचान
निज स्वरूप पह्चान, नुमाइश मेले वाले
झुक - झुक करें सलाम, खोमचे-ठेले वाले
कहं ‘काका' कवि, सब्ज़ी-मेवा और इमरती
चरना चाहे मुफ़्त, पुलिस में हो जा भरती

कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान
मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान
डर जाये भगवान, बनाओ मूंछे ऐसीं
इंठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं
कहँ ‘ काका ', जिस समय करोगे धारण वर्दी
ख़ुद आ जाये ऐंठ-अकड़-सख़्ती-बेदर्दी

शान-मान-व्यक्तित्व का करना चाहो विकास
गाली देने का करो, नित नियमित अभ्यास
नित नियमित अभ्यास, कंठ को कड़क बनाओ
बेगुनाह को चोर, चोर को शाह बताओ
‘काका', सीखो रंग-ढंग पीने-खाने के
‘रिश्वत लेना पाप' लिखा बाहर थाने के

2. मोटी पत्नी

ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल।
किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल।
लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती घर का धंधा।
आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा।
कह ‘ काका ' कविराय, खाय वह ठूंसमठूंसा।
यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा।


3. महंगाई

जन-गण मन के देवता, अब तो आंखें खोल
महंगाई से हो गया, जीवन डांवाडोल
जीवन डाँवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू
कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू
कहं 'काका' कवि, दूध-दही को तरसे बच्चे
आठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
'क्यू' में धक्का मारकर, पहुंच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहं 'काका' कवि, करके बंद धरम का कांटा
लाला बोले-भागो, खत्म हो गया आटा