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स्वतंत्रता दिवस से पहले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की एक छोटी सी कहानी

आगरा में एक वर्ष तक ठहरे थे भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु, गिरफ्तारी के बाद पहुंचे थे लाहौर। आगरा के कई लोग जाते थे गवाही देने।

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आगरा

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Dhirendra yadav

Aug 11, 2017

Independence day 2017

Independence day 2017

आगरा। Independence day यानि आजादी का पर्व। 71 वां स्वतंत्रता दिवस इस बार हम मनाने जा रहे हैं। पर आजादी की इस लड़ाई में हमें उन्हें भी याद रखना बेहद जरूरी है, जो जानते थे, कि जिस राह पर वो चल रहे हैं, उस पर बहुत कांटे हैं। इन कांटों पर भी चलना मंजूर किया, आजादी के दीवाने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू ने। आगरा से गेहरा नाता इन तीनों का ही है। पूरे एक वर्ष आगरा को इन तीनों महान क्रांतिकारियों को रखने का गौरव प्राप्त हुआ। आगरा से जुड़ी इन तीनों के बारे में बहुत ही रौचक कहानी है, पढ़िए पत्रिका की खास रिपोर्ट।

ये है रौचक कहानी
अमर शहीद सरदार भगत सिंह की आपने कई कहानियां सुनी होंगी, लेकिन एक रौचक कहानी आगरा से भी जुड़ी है। सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु तीनों ही आगरा में एक वर्ष तक रुके थे। यहां पर उन्होंने वहीं बम्ब बनाया था, जिससे अंग्रेजों की संसद हिल गई थी। ये स्थान है नूरी गेट। जिस स्थान पर ये तीनों क्रांतिकारी रुके थे, उसी के सामने बेनी प्रसाद की दूध की दुकान थी। बेनी प्रसाद के पुत्र सीताराम ने बताया कि पिता बताते थे, कि वे तीनों प्रतिदिन उनकी दुकान पर दूध पीने के लिए आया करते थे। काफी देर तक दुकान पर बैठते थे और बातें करते थे।







नशा थी आजादी
सरदार भगत सिंह और उनके साथियों का जोश और जवानी उस समय चरम पर थी। सीताराम ने बताया कि पिता बताया करते थे, आजादी की वो दीवानिगी, सरदार भगत सिंह के लिए एक नशा थी। परिवार की न कोई चिंता थी और नाहीं जान जाने का डर। बस फिक्र थी, तो भारत मां की। सीताराम ने बताया कि पिता बताते थे, सरदार भगत सिंह खाना बहुत कम खाया करते थे, लेकिन दूध उन्हें बहुत पंसद था। वहीं उनके यहां की रबड़ी भी तीनों को बेहद पसंद थी। उनकी गिरफ्तारी के बाद तीनों को लाहौर जेल भेज दिया गया। बेनी प्रसाद अंग्रेजों की अदालत में हर महीने गवाही के लिए आगरा से जाते थे, उनके साथ आगरा के कई अन्य लोग भी यहां से लाहौर जाते थे।







डर तो था ही नहीं
सीताराम ने बताया कि पिता इन तीनों क्रांतिकारियों के बारे में जब बताते थे, तो गर्व से सीना फूल जाता था। वे बताते थे, कि जब पेशी के दौरान उन तीनों से मुलाकात होती थी, हमेशा कहा करते थे, कि बाबा रबड़ी नहीं लाए। उन तीनों के ये बोल सुन आंखें भर आती थीं, तो वे कहते थे, कि बाबा रोना क्यों, आप परेशान न हो, गवाही कैसी भी हो, हमें मिलनी फांसी ही है।

अजीब सी थी बैचेनी
सीताराम ने बताया कि 24 मार्च 1931 की सुबह, लोगों में एक अजीब सी बेचैनी आगरा में ही नहीं पूरे देश में थी। यह खबर थी सरदार भगत सिंह और उनके दो साथी सुखदेव और राजुगुरु की फांसी की। इस खबर को लोग आसपास से सुन रहे थे और उसका सच जानने के लिए यहां-वहां भागे जा रहे थे और अखबार तलाश रहे थे, जिन लोगों को अखबार मिला उन्होंने काली पट्टी वाली हेडिंग के साथ यह खबर पढ़ी कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में पिछली शाम 7:33 पर फांसी दे दी गई। इस खबर की पुष्टि होने के बाद लोगों की आंखों में आंसू थे। आगरा के उस स्थान पर लोगों की भीड़ जमा थी, जहां सरदार भगत सिंह एक वर्ष रहे थे। उनसे जुड़ी कहानियां आज भी यहां लोग अपने बच्चों को सुनाते हैं।