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हर बीमारी का इलाज वात्सल्य, पढ़िए बड़ी सीख देने वाली ये कहानी

वत्सला को समझ आ गया था कि वात्सल्य का कोई बंधन, कोई सीमा नहीं होती ! यह तो जितना लुटाओ, उतना बढ़ता है । वत्सला के जीवन में खुशियाँ लौट आई थीं।

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pummy sadana

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सुबह का आलम था। निःशब्द सवेरा ! न पत्तों की खड़खड़ाहट, न कोई और स्वर; बिल्कुल उसके जीवन की तरह। नीम के दरख्त को देखती हुई, खिड़की पर अकेली खड़ी वो यही सोच रही थी ! नितेश अभी एक घंटे पहले ही दफ्तर गए थे, पर वत्सला को लग रहा था जैसे सदियाँ बीत गई हों। अभी तो पहाड़ जैसा दिन पड़ा था! हालाँकि उसे पुस्तकें पढ़ने का और कढ़ाई का बहुत शौक था, लेकिन आजकल उसका दिल उनमें भी नहीं लगता था। एक अजीब सा खालीपन कचोटता रहता था। एक ही बात खलती रहती थी उसे ! सब कुछ था उसके पास, पर बस संतान की कमी बहुत सताती थी। यही एक कमी खाये जा रही थी उस को। आज भी खिड़की पर खड़ी वह अपना एक पसंदीदा गीत गुनगुना रही थी:
'कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता,
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता !'

बस ऐसे ही उदासियों से भरे दिन बीत रहे थे। धीरे-धीरे वत्सला बिल्कुल चुप रहने लगी। हँसना-बोलना भूल ही गई हो जैसे ! वक्त बीतता गया और वत्सला बिस्तर पकड़ती गई। इच्छायें मरती चली गयीं उसकी ! बस चुपचाप बिस्तर पर पड़ी रहती। दिनोंदिन उसकी हालत बिगड़ती चली गई। अब तो उठना-बैठना भी मुश्किल हो गया था। बस, निढाल पड़ी रहती ! कितने ही चिकित्सक आए, लेकिन किसी को भी वत्सला की बीमारी समझ नहीं आई। मर्ज़ तन का होता, तो समझ आता न ! मर्ज़ तो मन का था। मन तो मर गया था उसका, बस बदन में साँसें चल रही थीं ! न जाने कैसे इतनी समझदार वत्सला एक ही दुःख में कहीं गहरे उतरते-उतरते डूबती चली गई। वो कहते हैं न कि 'चिन्ता चिता की जननी है', बस यही बात वत्सला के रोग की जड़ बन गई ! नितेश, जो वत्सला से अत्यन्त प्रेम करता था; उसके कष्ट से आकुल था। चिन्ता में घुला जा रहा था वो ! घर तो अब नौकरों के भरोसे ही चल रहा था।

फिर एक दिन उस के दफ्तर के चौकीदार ने उससे बहुत अनुरोध किया, कि नितेश उस की छोटी-सी बिना माँ की बेटी रश्मि को अपने घर ले जाए और वत्सला की सेवा-सुश्रुषा के लिए रख ले ! नितेश ने बहुत मना किया कि वो इतनी छोटी बच्ची से काम नहीं करवाएगा। मगर चौकीदार के बहुत याचना करने पर कि 'मेरी बेटी पल जाएगी साहब, अकेले छोड़ना पड़ता है'; वह उसे घर ले आया: यह सोच कर कि खेलती रहेगी और घर में रौनक बनी रहेगी ! अब रश्मि वत्सला के कमरे में ही खेलती रहती थी। नितेश ने उसे कुछ रंग भरने वाली पुस्तकें ला दीं; कभी वह उन में रंग भरती, तो कभी उल्टी-सीधी लकीरें खींचती रहती ! वत्सला बिस्तर पर पड़ी-पड़ी उसे देखती रहती। एक दिन सड़क पर से जाती बारात में गाने की आवाज़ सुन कर रश्मि के पैर थिरकने लगे ! उसके नृत्य को देखते-देखते वत्सला के मुख पर एक हल्की-सी मुस्कान क्या आई, वही मुस्कुराहट उसके जीवन की ओर वापिस लौटने का सबब बन गई। अगले दिन अपने पास बैठी रश्मि को गलत रंग करते देख वत्सला के हाथ में हल्की-सी हरकत हुई, लेकिन लाख कोशिश करने के बावजूद तूलिका नहीं पकड़ पाई वो ! पर अब थोड़ी-थोड़ी हरकत उसके बदन में होने लगी थी। यों ही कुछ दिन और बीत गए ! उस दिन रश्मि अपने पिता से मिलने गई थी। जब वह काफी देर तक दिखाई नहीं दी, तो वत्सला बहुत यत्न करके उठी और बेहद धीरे-धीरे चल कर उसे पूरे घर में ढूँढने लगी ! यही उसके स्वस्थ होने की ओर प्रथम पग था । शाम को जब रश्मि नितेश के साथ लौटी, तो वत्सला ने उसे धीरे से पकड़ कर अपने पास बैठा लिया और उसके बिखरे बालों को सँवारने लगी ! वत्सला के नाम को सार्थक करते, उस में कूट-कूट कर भरे वात्सल्य को एक मार्ग मिल गया था। अब तो वह रश्मि का हाथ पकड़ कर उसे रंग करना भी सिखाने लगी थी ! नितेश कुछ प्राथमिक कक्षा की हिन्दी, अंग्रेज़ी व गणित की पुस्तकें ले आया। नित्य वत्सला रश्मि को थोड़ा पढ़ाती, लेकिन जब थक जाती तो आराम कर लेती ! कभी-कभी रसोईघर में जा कर उस के लिए कुछ हल्का-फुल्का खाने को बना लाती। वत्सला के चेहरे की रंगत अब लौटने लगी थी !

उस दिन उसकी खाना बनाने वाली भी अपने बेटे को ले आई और बोली: 'मेमसाब, मेरा मर्द आज आधारकार्ड बनवाने गया है; तो मैं इसे साथ ले आई। चुपचाप बैठा रहेगा, आप को बिल्कुल परेशान नहीं करेगा !' लेकिन कुछ ही देर में बाल-सुलभ चंचलता के चलते वह रश्मि के साथ खेलने लगा। बच्चों के शोर से उस के घर में रौनक आ गई थी ! थोड़े समय पश्चात् वत्सला राजू को भी रश्मि के पास बैठा कर हल्का-फुल्का पढ़ाने लगी। अब वह अक्सर राजू को बुलवा लेती ! दोनों बच्चे कभी खेलते, कभी पढ़ते; तो कभी रंग करते। समय पंख लगा कर उड़ने लगा था ! पूर्णत: स्वस्थ हो गई थी वत्सला। हँसती-खिलखिलाती और बच्चों के साथ बच्ची बन जाती। उस की झाड़-पोंछ करने वाली की बिटिया भी आने लगी थी अब पढ़ने ! धीरे-धीरे वत्सला ने ऐसे ही बहुत सारे विनीत बच्चों का शिक्षालय बना लिया अपना घर ! नितेश के वापस आने से पहले उन्हें पढ़ाती और गृह-कार्य दे कर उन के घर भेज देती। रश्मि कभी-कभी नितेश के साथ अपने पिता से मिलने चली जाती ! दूर-दूर तक 'वात्सल्य-गृह' का नाम होने लग गया था । नितेश के जीवन में भी उस की ज़िन्दगी वापिस लौट आई थी ! नीम का पेड़ भी अब आमद-रफ्त था।

सीख
वत्सला को समझ आ गया था कि वात्सल्य का कोई बंधन, कोई सीमा नहीं होती ! यह तो जितना लुटाओ, उतना बढ़ता है । वत्सला के जीवन में खुशियाँ लौट आई थीं। जीने की राह जो मिल गई थी उसे।

लेखिकाः पम्मी सडाना, आगरा

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