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जानिए किसने शुरू की थी कांवड़ यात्रा और कितनी तरह की होती है?

जानिए कांवड़ (कांवर) यात्रा का इतिहास, महत्व, नियम और कहानी

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आगरा

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suchita mishra

Aug 07, 2018

Kanwar Yatra

Kanwar Yatra

श्रावण मास चल रहा है। इस बीच जगह जगह शिव भक्त कांवड़ लेकर गंगाजल लेने जाते हैं फिर उस जल से भोलेनाथ का जलाभिषेक करते हैं। ऐसे में आपके सामने जब भी कोई कांवड़ यात्रा का जिक्र करता होगा तो आपके जेहन में एक सवाल आता होगा कि कांवड़ यात्रा आखिर किसने शुरू की होगी? आज हम आपको बताते हैं कि कांवड़ यात्रा कैसे शुरू हुई, किसने शुरू की, कितने प्रकार की होती है और कांवड़ के दौरान नियम क्या होते हैं।

ये है कांवड का इतिहास
भगवान परशुराम भगवान शिव के परम भक्त थे। मान्यता है कि वे सबसे पहले कांवड़ लेकर बागपत जिले के पास “पुरा महादेव”, गए थे। उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से गंगा का जल लेकर भोलेनाथ का जलाभिषेक किया था। उस समय श्रावण मास चल रहा था। तब से इस परंपरा को निभाते हुए भक्त श्रावण मास में कांवड़ यात्रा निकालने लगे।

कई प्रकार की होती है कांवड़ यात्रा
शुरुआत में कांवड़ यात्रा पैदल ही निकाली जाती थी। लेकिन समय के साथ इसके तमाम प्रकार और नियम कायदे सामने आ गए। जानिए उनके बारे में।


1- खड़ी कांवड़ के नियम सबसे कठिन
सबसे कठिन होती है खड़ी कांवड़ यात्रा। इसमें भक्त कंधे पर कांवड़ लेकर पैदल यात्रा करते हुए गंगाजल लेने जाते हैं। इस कांवड़ के नियम काफी कठिन होते हैं। इस कांवड़ को न तो जमीन पर रखा जाता है और न ही कहीं टांगा जाता है। यदि कांवड़िये को भोजन करना है या आराम करना है तो वो कांवड़ को या तो स्टैंड में रखेगा या फिर किसी अन्य कांवडिये को पकड़ा देगा। लेकिन न तो जमीन पर रखेगा और न ही किसी पेड़ की टहनी पर टांगेगा।

2- झूमते हुए जाते हैं भक्त झांकी वाली कांवड़ में
कुछ कांवड़िये झांकी लगाकर कांवड़ यात्रा करते हैं। ये किसी ट्रक, जीप या खुली गाड़़ी में शिव मूर्ति या प्रतिमा रखकर भजन चलाते हुए कांवड़ लेकर जाते हैं। इस दौरान भगवान शिव की प्रतिमा का श्रंगार किया जाता है और लोग भजन पर झूमते हुए यात्रा करते हैं। इस तरह की कांवड़ यात्रा को झांकी वाली कांवड़ कहा जाता है।

3- अनोखी ही नहीं मुश्किल भी होती है डाक कांवड़
डाक कांवड़ वैसे तो झांकी वाली कांवड़ जैसी ही होती है। इसमें भी किसी गाड़ी में भोलेनाथ की प्रतिमा को सजाकर रखा जाता है और भक्त शिव भजनों पर झूमते हुए जाते हैं। लेकिन जब मंदिर से दूरी 36 घंटे या 24 घंटे की रह जाती है तो ये कांवड़िए कांवड़ में जल लेकर दौड़ते हैं। ऐसे में दौड़ते हुए जाना काफी मुश्किल होता है। इस तरह की कांवड़ यात्रा को करने से पहले संकल्प करना होता है।