
सुख और आनन्द में अन्तर, भाव का अर्थ समझना है तो पढ़ें ये खबर
आगरा। श्रीराम भी दशानन थे। रावण के दस शीश थे और श्रीराम के दस गुण। रावण के शीश देखे जा सकते हैं, क्योंकि वह प्रदर्शन है। जबकि श्रीराम का अर्थ दर्शन है। इसलिए पुरुषोत्तम होने के बाद भी उनमें प्रदर्शन नहीं। रावण उपासक तो था लेकिन धार्मिक नहीं। जरूरी नहीं कि हर उपासक (पूजा करने वाला व्यक्ति) धार्मिक हो। इसीलिए रावण द्वारा शिवजी की बार-बार आराधना विफल हो गई और रामेश्वर में श्रीराम द्वारा की गई एक बार की पूजा सफल हो गई। प्रार्थना की सार्थकता तभी है जब प्रभु उसे स्वीकार करें।
कथा में समझाया
वनवासी रक्षा परिवार फाउंडेशन द्वारा कमला नगर जनक पार्क में आयोजित तीन दिवसीय चैतन्य महाप्रभु भाव कथा में व्यास पीठ से वैष्णवाचार्य श्रीपुण्डरीक जी गोस्वामी महाराज ने कथा में पहले दिन भाव का अर्थ स्पष्ट किया। कहा कि भावुकता ही मनुष्य की सार्थकता है। जिसे दिमाग से नहीं हृदय से महसूस किया जा सकता है। सबको अपना समझो। वैष्णव वो है जो दूसरे की तकलीफ को समझे। जहां मैं सुखी तू दुखी का भाव वह विकृति है। मेरे दुख से दूसरे को खुशी मिले यह भारत की संस्कृति है। जहां भावुकता है वहां भाव है। जो राग और ताल में झलकती है। जहां पेड़ पौधों और पशु पक्षियों के प्रति भी भावुकता हो वही मनुष्यता है। जब भगवान भावुक हुआ तो चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए। प्रेम में दिमाग लगाओगे तो वह व्यापार बन जाएगा। दिमाग लगाने से प्रेम रोने लगता है। दिमाग तुम्हें बचा सकता है, नचा नहीं सकता। खुशी और प्रसन्नता तो भाव से मिलती है। भगवान ने कभी नहीं कहा कि वह गिमाग में रहते हैं। उन्होंने हमेशा अपना स्थान हृदय बताया। तर्कों से समझोगे तो ईश्वर कभी समझ नहीं आएंगे। ईश्वर को तो बुद्धि के समर्पण से समझा जा सकता है।
गुरु का चयन प्रभाव देखकर नहीं स्वभाव देखकर करो
श्रीपुण्डरीक जी गोस्वामी महाराज ने कहा कि गुरु का चयन उसका प्रभाव नहीं बल्कि स्वभाव देखकर करना चाहिए। कथा गुरु की कृपा से होती है। जो कथा सुनकर या पढ़कर सुनाए, उससे कता नहीं सुननी चाहिए। जिस पर गुरु की कृपा हो, उसकी हर बात कथा होती है।
जीवन में शांति के चार सूत्र
श्रीपुण्डरीक जी गोस्वामी महाराज ने जीवन में शांति के चार सूत्र बताते हुए कहा कि परिवार में विश्वास होना चाहिए। निजी जीवन में पवित्रता, व्यापार में पारदर्शिता और प्रभु से प्रति प्रेम-भाव। यह जीन में सुख प्राप्ति के साच स्तम्भ है।
कीर्तन का भी मिला आनंद
कथा के साथ भक्तों ने कीर्तन का भी आनन्द लिया। कथा का शुभारम्भ मुख्य अतिथि अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कवि एवं चित्रकार बाबा सत्यनारायण मौर्य ने दीप जलाकर किया। इस अवसर पर स्वागत अध्यक्ष चंद्रमोहन अग्रवाल, राष्ट्रीय संरक्षक स्वरूप चंद्र गोयल, मुख्य यजमान प्रदीप शर्मा, माधवी, राधाबल्लभ अग्रवाल, संजय गोयल, भगवान दास बंसल, दिनेश बंसल कातिब, भगवान अग्रवाल, शांति स्वरूप गोयल, अनिल अग्रवाल, राजेश अग्रवाल, विवेक मोहन अग्रवाल, सुषमा अग्रवाल, कुसुम, मधु गोयल, अर्चना मित्तल आदि मौजूद थे।
Published on:
22 Dec 2018 05:30 am
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