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दिवाली पर इस पक्षी की बलि देने से घर में आती हैं लक्ष्मी, अंध विश्वास या सच!

आगरा के चंबल सेंचुरी में पहरेदारी बढ़ गई है। चंबल सेंचुरी की बाह रेंज में उल्लू की दो प्रजातियां मुआ और घुग्घू पाई जाती हैं। पक्षियों की रखवाली कर रहे हैं। जानें क्या है पूरा मामला।

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आगरा

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Upendra Singh

Nov 09, 2023

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अंधविश्वास के चलते उल्लू की बली चढ़ा दी जाती है। लोग दीपावली पर उल्लू की बलि देते हैं। इसी को देखते हुए आगरा की चंबल सेंचुरी में उल्लुओं की सुरक्षा में पहरेदारी बढ़ा दी गई है। चंबल सेंचुरी की बाह रेंज में उल्लू की दो प्रजातियां मुआ और घुग्घु पाई जाती है। नदी किनारे के टीलों के खुखाल, खंडहर और पेड़ पर दिख जाते हैं।

अंधविश्वास में उल्लू की बलि दी जाती है
रेंजर उदय प्रताप सिंह ने मी‌डिया को बातया कि उल्लू का वैज्ञानिक नाम स्ट्रिगिफोर्मिस है। अंधविश्वास के चलते दिवाली पर उल्लू की बलि दी जाती है। इस वजह से इनकी पहरेदारी बढ़ा दी गई है। तंत्र-मंत्र के लिए उल्लू तस्करी की आशंका पर वन विभाग गांव वालों को जागरूक किया। इसके साथ मारने और पकड़ने वालों को देखने पर सूचना देने के लिए कहा गया है।


क्या हैं पौराणिक कहानियां
पौराणिक कहानियों की बात की जाए तो उल्लू को बुद्धिमान माना जाता है। प्राचीन यूनानियों में बुद्धि की देवी, एथेन के बारे में कहा जाता है कि वह उल्लू का रूप धारण कर पृथ्वी पर आईं थी। ‌हिंदू संस्कृति में माना जाता है कि उल्लू समृद्धि और धन लाता है। धन की देवी लक्षमी का वाहन भी उल्लू को माना जाता है। लोगों का मानना है कि दीपावली की रात उल्लू की बलि देने से अगले साल तक के लिए धन-धान्य सुख संपदा बनी रहती है।

उल्लू अपना सिर 135 डिग्री तक घूम जाता है
उल्लू अपने सिर को दोनों तरफ 135 डिग्री तक घुमा सकता है। पलकें नहीं होने के कारण उनकी आंखें हमेशा खुली रहती है। उल्लू के पंख चौड़े और शरीर हल्का होने की वजह से उड़ान के समय आवाज नहीं होती। उल्लू संरक्षित श्रेणी का पक्षी है। उल्लू के शिकार या तस्करी पर कम से कम तीन साल की सजा का प्रावधान है।