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अगर आपके भी आसपास रहते हैं कबूतर तो समझिए इस जानलेवा बीमारी का खतरा सिर पर मंडरा रहा है…

विशेषज्ञ का कहना कि कबूतर आईएलडी बीमारी का बड़ा कारण हैं। इस बीमारी को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता।

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आगरा

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suchita mishra

Mar 27, 2019

lungs

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पुराने दौर में कबूतर चिठ्ठियों का आदान प्रदान कर संदेशवाहक के तौर पर काम किया करते थे, लेकिन अब ये बीमारियां लाते हैं। अगर आपके घर के आसपास भी कबूतर रहते हैं तो सावधान हो जाइए। श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. निष्ठा सिंह के मुताबिक फेफड़ों की बेहद गंभीर बीमारी आईएलडी (इंटरस्टीशियल लंग डिजीज) का एक बड़ा कारण कबूतर हैं। आईएलडी भारत में तेजी से अपने पैर पसार रही है। परेशानी की बात ये है कि इस बीमारी को दवाओं से नियंत्रित तो कर सकते हैं, लेकिन पूरी तरह ठीक नहीं कर सकते।

जानिए क्या है ILD
श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. निष्ठा सिंह के मुताबिक आईएलडी फेफड़ों की एक गंभीर बीमारी है। इसमें मरीज के फेफड़े सिकुड़ जाते हैं। इसके कारण व्यक्ति के शरीर में आक्सीजन का प्रवाह कम हो जाता है। इसके कारण मरीज को सांस संबंधी तमाम समस्याएं होती हैं। कई बार सूखी खांसी रहती है। जल्दी थकान होती है। डॉ. निष्ठा का कहना है कि सिकुड़े हुए फेफड़ों को वापस ठीक तो नहीं किया जा सकता, लेकिन सही समय पर रोग की पहचान करने के बाद नियमित दवा और परहेज की मदद से बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है।

भारत में मिलते हैं ILD HP के मरीज
डॉ. निष्ठा सिंह का कहना है कि रिसर्च में सामने आया है कि भारत में ILD Hypersensitivity Pneumonitis के मरीज सबसे ज्यादा पाए जाते हैं। इसे आईएलडी एचपी के नाम से भी जाना जाता है। इसमें भी यदि Acute ILD का इलाज तो आसानी से हो सकता है, लेकिन Chronic ILD का इलाज जीवनभर चलता है।

क्रॉनिक ILD HP का बड़ा कारण हैं कबूतर
विशेषज्ञ के मुताबिक क्रॉनिक आईएलडी एचपी का बड़ा कारण कबूतर हैं। कई बार कबूतर हमारे घर की खिड़कियों या रोशनदान में अपना घर बना लेते हैं। ऐसे में उनकी बीट या पंखों से आईएलडी की समस्या हो सकती है। इसके अलावा बंद कमरे की सीलन, कूलर की जालियों की गंदगी व फंगस से भी ये समस्या हो सकती है। रुमेटॉयड आर्थराइटिस, स्क्लेरोडर्मा और जॉगरेन सिंड्रोम के मरीजों को भी आइएलडी की परेशानी हो सकती है।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
अगर आपको थोड़ा चलने में थकान हो जाती है, सांस फूलने लगती है, सूखी खांसी या बलगम लगातार आ रहा है तो इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें। फौरन डॉक्टर को दिखाएं। वर्ना समस्या गंभीर रूप ले सकती है।

ये है उपचार
यदि आईएलडी की प्रारंभिक अवस्था होती है तो डॉक्टर एंटीबायोटिक, एंटीफिब्रोटिक, स्टेयरॉइड्स, इम्युनोसप्रेसिव दवाओं से उपचार करते हैं। बीमारी बढऩे पर मरीज को आजीवन ऑक्सीजन लेने की जरूरत पड़ सकती है। गंभीर अवस्था में यदि मरीज को बार-बार संक्रमण की शिकायत हो तो फेफड़ों का प्रत्यारोपण भी कराना पड़ सकता है।

बचने के लिए करें ये उपाय
बीमारी के कारण से बचाव ही इसका इलाज है। कबूतर या किसी भी तरह की बर्ड से पूरी तरह दूरी बनाएं। घर की खिडकियों में जालियां लगवाएं। किचेन में एग्जॉस्ट का प्रयोग करें। योग प्राणायाम नियमित रूप से करें।