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बहुत रोचक है राधाष्ठमी और राधा के जन्म की ये कहानी

आखिर क्यों मनाई जाती है राधाष्टमी, राधा के जन्मोत्सव पर पूरे ब्रज में धूमधाम से मनाई जा रही है Radha Ashtami

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आगरा

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Abhishek Saxena

Sep 17, 2018

radha ashtami 2018

radha ashtami 2017

आगरा। आज ब्रज में धूमधाम के साथ radha ashtami का पर्व मनाया जा रहा है। राधाष्टमी पर्व के संबंध में कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं। ज्योतिषाचार्य और भविष्यवक्ता पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि कृष्ण की राधा हैं और राधा के हैं कृष्ण, सारे जगत में राधा-कृष्ण के इस पावन एवं पवित्र संबंध को जाना जाता है। राधा के जीवन के अन्य पहलुओं के बारे में बताते हुए कहा कि राधा के जन्म की सटीक जानकारी ब्रह्मवैवर्त पुराण के माध्यम से प्राप्त होती है। इस महान ग्रंथ के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाजी का जन्म हुआ और इसी दिन को आज भी राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

ब्रज में श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधा का हुआ था जन्म
इस ग्रन्थ के अनुसार माना जाता है कि इसी दिन ब्रज में श्रीकृष्ण की प्रेयसी राधा का जन्म हुआ था। लेकिन, राधा के जन्म की कहानी साधारण नहीं, अपितु चमत्कारी है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, राधा भी श्रीकृष्ण की तरह ही अनादि और अजन्मी हैं। अर्थात् उनका जन्म माता के गर्भ से नहीं हुआ। वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि ब्रह्मवैवर्त पुराण में दर्ज राधा के जन्म से जुड़े एक पौराणिक कथा के अनुसार देवी राधा भगवान श्री कृष्ण के साथ गोलोक में निवास करती थीं। एक बार देवी राधा गोलोक में नहीं थीं। तब श्री कृष्ण अपनी एक अन्य पत्नी विरजा के साथ विहार कर रहे थे। राधाजी को इसकी जैसे ही सूचना मिली वह गोलोक लौट आईं। इन्होंने विरजा को श्री कृष्ण के संग विहार करते हुए देखा तो श्रीकृष्ण को भला बुरा कहने लगीं। राधा को क्रोधित देखकर विरजा नदी बनकर वहां से चली गईं। लेकिन, राधा का यह क्रोध श्रीकृष्ण के सेवक और मित्र श्रीदामा को गवारा ना हुआ। उन्होंने राधा से ऊंची आवाज में बात की और राधा को अपमानित किया। इससे देवी राधा और क्रोधित हो गईं और क्रोधावस्था में श्रीदामा को यह शाप दिया कि अगले जन्म में वे एक राक्षस कुल में जन्म लेंगे। श्रीदामा ने भी आवेश में आकर देवी राधा को पृथ्वी पर मनुष्य रूप में जन्म लेने का श्राप दे दिया। इस श्राप के कारण श्रीदामा, शंखचूड़ नामक असुर बना और देवी राधा को कीर्ति और वृषभानु जी की पुत्री के रूप में जन्म लेना पड़ा। लेकिन, इनका जन्म देवी कीर्ति के गर्भ से नहीं हुआ था।

एक दूसरे को श्राप दे दिया
पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि इस कथा के अनुसार जब श्रीदामा और राधा ने एक-दूसरे को श्राप दे दिया। उसके बाद श्रीकृष्ण चिंता में ग्रस्त राधा के पास आए और उनसे कहा कि देवी आप पृथ्वी पर जन्म तो लेंगीं लेकिन, हमेशा मेरे आसपास ही रहेगीं। वे आगे बोले, आपको गोकुल में देवी कीर्ति और वृषभानु की पुत्री के रूप में जन्म लेना होगा। वहां तुम्हारा विवाह रायाण नामक एक वैश्य से होगा और सांसारिक तौर पर तुम रायाण की पत्नी कहलाओगी। रायाण मेरा ही अंश होगा। राधा रूप में तुम मेरी प्रिया बनकर रहोगी और कुछ समय तक आपका मेरा विछोह रहेगा। इस के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने देवी से कहा कि अब आप वृषभानु के घर में जन्म लेने की तैयारी करें। पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि संसार की दृष्टि में राधा की माता कीर्ति गर्भवती हुईं लेकिन, उनके गर्भ में राधा ने प्रवेश नहीं किया। कीर्ति ने अपने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था और योगमाया के सहयोग से कीर्ति ने वायु को जन्म दिया लेकिन वायु के जन्म के साथ ही वहां राधा कन्या रूप में प्रकट हो गईं। इसलिए यह माना जाता है कि देवी राधा अयोनिजा थीं।

देवी रुक्मिणी का जन्म भी अष्टमी तिथि को हुआ
वैदिक सूत्रम चेयरमैन पंडित प्रमोद गौतम ने बताया कि देवी रुक्मिणी का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था। देवी राधा वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थी। राधा जी के जन्म में और देवी रुक्मिणी के जन्म में एक अन्तर यह है कि देवी रुक्मिणी का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधाजी का शुक्ल पक्ष में। राधाजी को नारद जी के श्राप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुकिमणी से श्रीकृष्ण की शादी हुई। राधा और रुक्मिणी यूं तो दो हैं। लेकिन, दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं।