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Eid-E-Milad 2018 : बारावफात मुस्लिमों में लिए है बेहद खास, जानिये क्या है कहानी और महत्व

ईदमिलादुन्नबी (Eid-E-Milad 2018) यानि बारावफात (Barawafat) को इस्लाम के बानी हजरत मोहम्मद साहब की इस माह की चाँद की 12 तारीख को पैदायश हुई और इसी रबी उल अव्वल को आप इस दुनिया से रुखसत भी हुए।
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आगरा

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Dhirendra yadav

•

Updated: 21 Nov 2018, 6:07 PM IST

Eid Milad Un Nabi

Eid Milad Un Nabi

आगरा। ईदमिलादुन्नबी (Eid-E-Milad) यानि barawafat साल के 12 महीनों में वैसे तो हर माह कोई न कोई मुस्लिम त्योहार मनाया ही जाता है, लेकिन इस माह बारावफात अन्य त्योहारों से अफजल माना जाता है। इसका कारण यह है कि इस माह की चाँद की 12 तारीख को इस्लाम मजहब के बानी हजरत मोहम्मद साहब की पैदायश हुई और इसी रबी उल अव्वल को आप इस दुनिया से रुखसत भी हुए।

बारावफात की ये है कहानी
हजरत रसूल उल्लाह मोहम्मद सल्लाह औह-आलै वसल्लम को खुदा ने पैदा करके इंसानों की हिदायत के वास्ते जमीं पर भेजा, ताकि वह लोगों को उम्दा तालीम देकर उन्हें नेक इंसान बनाये। यह सिलसिला हजरते आदम से शुरू हुआ और लगभग 124000 नबी और रसूल तशरीफ लाए। उनमें सबसे आखिर में आज से साढ़े चौदह सौ साल पहले 20 अप्रैल 571 ईसवी मुताबिक आज के दिन 12 रबी-ए-उल-अव्वल पीर (सोमवार) के दिन सुबह अरब के मक्का शहर में हजरते आमना खातून के मुबारिक शिकम (पेट) से मोहम्मद साहब पैदा हुए।

जानिये क्यों रखा गया नाम मोहम्मद
आपका नाम मोहम्मद रखा गया क्योंकि पैदायश से पहले ही आपके वालिद (पिता) का इंतकाल हो गया था। आपकी परवरिश आपके दादा अब्दुल मुन्तलिब ने की। आपके दादा काबा शरीफ के मुतवल्ली थे। अरब के लोग उनको बहुत इज्जत देते थे। मोहम्मद सल्लाह-औ-आलै बसल्लम की शादी 25 साल की उम्र में मक्के की एक बेवा (विधवा) औरत खदीजा से हुई। खदीजा की उम्र उस वक्त 40 साल की थी। आप गुजर बसर के लिये तिजारत (व्यापार) करते थे।

40 साल की उम्र में किया नबी होने का ऐलान
शादी के 15 साल बाद यानी 40 साल की उम्र में आपने अल्लाह के हुक्म से अपने नवी होने का ऐलान किया। यह वह दौर था कि अरब के लोग ज़हालत के अंधेरे में डूबे हुये थे। वह खुदा को तो भूले ही हुये थे। इंसानियत नाम की भी कोई चीज उनमें नहीं थी। अपने हाथों से अपनी ही बेटियों को जिन्दा दफ़ना दिया करते थे। जरा-जरा सी बात पर झगड़ा करते हुये तलवारों का इस्तेमाल करना आम बात थी।

कुरआन शरीफ नाजिल
मोहम्मद साहब ने उन्हें उन तमाम बुरी रस्मों और बुरी बातों से रोका और अच्छे काम करने का हुक्म दिया। अल्लाह की तरफ से उनपर कुरआन शरीफ नाज़िल हुआ जो इंसानों की हिदायत के लिये है। उसमें हर अच्छी बात का हुक्म दिया गया और बुरी बातों से रोका गया।

अमन और शांति की बात
आपने हमेशा अमन और शान्ति कायम करने की बात की। कभी भी आपने किसी पर जुलमन तलवार नहीं उठायी। आपने हमेशा कमजोरों, गरीबों और मजलूमों की मदद की, भूखों को खाना खिलाया और नंगों को कपड़ा पहनाया। आपकी कुल उम्र 63 साल की हुई, अल्लाह ने आपको जिस मक़सद के तहत दुनिया में भेजा था, वह आपने बहुत ही खूबसूरती के साथ अंजाम तक पहुँचाया।

मदीना में है मजार
आज पूरी दुनिया में इस्लाम मजहब के मानने वाले पाये जाते हैंस आप पर अपनी जान कुर्बान करने वाले हर साल 12 रवी-उल-अव्वल को ईदमिलादुन्नवी का जुलूस निकालकर शहर व शहर ईद-उल-मिलादुन्नवी की महफ़िले सजाकर उनकी बारगाह में खिराजे अकीदत पेश करते हैं। हजरत का मज़ार अरब शहर के मदीना शरीफ में है। हर वर्ष हज यात्रा के दौरान दुनिया के हर कोने से लाखों लोग यहाँ तशरीफ लाकर आपके मजारे-शरीफ का दीदार करते हुए सुकून हासिल करते हैं।

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