
ताजमहल
आगरा। ताजमहल का विवादों से गहरा नाता है। दशकों से ताजमहल को भगवान शिव का मंदिर बताया जाता रहा है। पुरुषोत्तम नागेश ओक ने अपनी पुस्तक में ताजमहल को मंदिर बताने वाले साक्ष्य दिए हैं, लेकिन इतिहास के जानकार इन्हें कपोल कल्पित बताते हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत की गई, लेकिन बात नहीं बन सकी। ताजमहल को मंदिर बताने वाली एक याचिका आगरा के न्यायालय में चल रही है। पुरातत्व विभाग के जवाब ने याचिका की धज्जियां उड़ा दी हैं। इसके बाद भी याचिकाकर्ता की ओर से कहा जा रहा है हम साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे और सबको मानना ही पड़ेगा कि ताजमहल शिव मंदिर है।
ये है याचिका
गोमती नगर, लखनऊ के अधिवक्ता हरिशंकर जैन और अन्य वकीलों ने आगरा के वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश कुलश्रेष्ठ के माध्यम से अदालत में परिवाद दाखिल किया है। वाद संख्या 357/2015 लॉर्ड अग्रेश्वर महादेव नाग नाथेश्वर विराजमान मंदिर तेजोमहालय बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (भारत सरकार), गृह मंत्रालय, पुरातत्व विभाग, केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय की सुनवाई अपर सिविल जज सीनियर डिवीजन अभिषेक सिन्हा की अदालत में चल रही है। याचिका में दावा किया गया है कि ताजमहल शिव मंदिर है।
एएसआई का जवाब- ताजमहल मंदिर नहीं
भारत सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने अदालत में प्रतिवाद दाखिल किया है। इसमें कहा गया है कि ताजमहल मंदिर नहीं, मकबरा है। इसका निर्माण शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज महल की याद में किया था। यह भी कहा गया है कि ताजमहल के संबंध में स्थानीय अदालत को सुनवाई का अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह की व्यवस्था एक आदेश में दी है। मामले की सुनवाई 11 सितम्बर, 2017 को होगी।
मंदिर होने के अनेक साक्ष्यः राजेश कुलश्रेष्ठ
वादी की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश कुलश्रेष्ठ का कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से मकबरा होने का कोई सबूत नहीं दिया गया है। हमारे पास अनेक ऐतिहासिक साक्ष्य हैं, जिनसे यह साबित होता है कि ताजमहल शिव मंदिर है। स्वयं शाहजहां ने माना है। एएसआई ने पहले जवाब दाखिल नहीं किया था। हमने इस पर आपत्ति प्रकट की थी। इसके बाद प्रतिवाद प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने कहा कि ताजमहल को वक्फ बोर्ड ने अपनी संपत्ति बताया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थगनादेश दिया है। इस तरह के मामले सिविल कोर्ट में नहीं सुने जा सकते हैं। पुरातत्व विभाग गलत प्रतिवाद दाखिल करके गुमराह कर रहा है। यह भी है कि एएसआई ने अपनी बात के समर्थन में कोई शपथपत्र नहीं दिया है। केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय औऱ गृह मंत्रालय कोर्ट में हाजिर नहीं हो रहे हैं। इस पर भी आपत्ति की जा रही है। भारत सरकार औऱ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ही कोर्ट में प्रस्तुत हो रहे हैं।
Published on:
25 Aug 2017 10:14 am
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