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क्या है वृद्धावस्था, क्यों होने चाहिए वृद्धाश्रम

अगर हम भविष्य में सम्मान चाहते हैं तो हमें आज बुजुर्गों को सम्मान देना सीखना होगा

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sunil jain

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आगरा। आज बुजुर्गों की समस्या अकल्पनीय है। वृद्धावस्था अभिशाप होती जा रही है। उनका जीवनयापन बहुत कठिन होता जा रहा है। कोई चलने में असमर्थ है तो कोई अपाहिज सदृश बिस्तर को ही अपनी नियति मानकर जीवन निर्वाह कर रहा है। यदि वे उच्चवर्गीय हैं तो उनकी संतान ने नर्स, अटेंडेंट या बहुत सारे पैसों की व्यवस्था कर दी है, ताकि उन लोगों का जीवन भौतिक सुख-सुविधा से परिपूर्ण हो। वृद्धाश्रमों में भीड़ बढ़ती जा रही है। अगर उनके दुखड़े सुनने बैठ जाओ तो पता चलता है कि संतानें उनसे उनकी जमीनें, मकान, दुकानें अपने नाम लिखाकर उन्हें वहां छोड़ गई हैं। बुजुर्गों की स्थिति पर चिंतन करते हुए यह बातें समाजसेवियों और चिंतनशील व्यक्तियों ने कहीं।

कहीं। वृद्धावस्था के बारे में किसी ने क्या खूब लिखा है-

हमने ये दुनिया सरायफानी देखी

हर चीज यहां आनी-जानी देखी

आके न जाए वो बुढ़ापा देखा

जाके न आए वो जवानी देखी।

आखिरी समय में माता-पिता को सहारा दें

सामाजिक संस्था लीडर्स आगरा की ओर से गुरुवार को मदिया कटरा स्थित होटल वैभव पैलेस में वृद्धावस्था-वर्तमान परिवेश में विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य बुजुर्गों की सामाजिक, पारिवारिक समस्याओं और उनके स्वास्थ्य पर चिंतन करना था। सर्वप्रथम पारिवारिक जिम्मेदारियां विषय पर संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता के रूप में आरएसएस के बृज प्रांत प्रचार प्रमुख केशव देव शर्मा ने कहा कि जब एक मां-बाप अपने बच्चों का पहला कदम उठाने में हाथ की अंगुली थामकर उनकी मदद कर सकते हैं, तो बच्चों का भी यह फर्ज बनता है कि माता-पिता के आखिरी समय में उन्हें सहारा दें।

वृद्धावस्था उपेक्षित अवस्था नहीं

उन्होंने कहा कि सही मायनों में वृद्धावस्था आत्मसंतोष की अवस्था में परिणित हो जाती है। यह जीवन का अंत अथवा उपेक्षित अवस्था नहीं है अपितु संपूर्ण जीवन जीने के बाद की क्रियाशील, श्रेष्ठ, शांत एवं चरम अवस्था है। जीवन में कुछ और बेहतर करने और कार्य को पूर्ण करने की चिंता व्यक्ति की आत्मभावना को कभी वृद्ध नहीं होने देती।

दादी-नानी की कहानियां विलुप्त

श्री शर्मा ने कहा कि दुखःद यह है कि संयुक्त परिवार से एकाकी परिवार की ओर बढ़ते युग में हमने बुजुर्गों का ध्यान रखना बंद कर दिया है। दादी-नानी की कहानियां विलुप्त हो गई हैं। दादाजी या नानाजी के कंधे पर बैठकर मेला देखने जाते बच्चे अब कहीं नजर नहीं आते।

ऐसे पैसे का क्या लाभ

बुजुर्गों की स्वास्थ्य देखभाल विषय पर बोलते हुए डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी डा. गिरजाशंकर शर्मा ने युवा पीढ़ी के पलायन को बड़ी समस्या बताया। उन्होंने कहा कि बच्चे जब विदेश में स्थापित हो जाते हैं, तो उनका ध्यान सिर्फ पत्नी और बच्चों तक सीमित हो जाता है, जबकि माता-पिता यहां एकाकी जीवन जी रहे होते हैं। आज अगर हम आंकडे निकालकर देख लें तो विदेशों से अपने माता-पिता के लिए बच्चे जो पैसा भेजते हैं, वो करोड़ों में है, लेकिन इस पैसे का कोई इस्तेमाल बुजुर्गों के लिए नहीं है अगर बच्चे उनके पास नहीं है। देश के कई हिस्सों में तो इस पलायन की वजह से हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि बीमारी से लड़ते-लड़ते बुजुर्ग दुनिया छोड़ जाते हैं और उनके पार्थिव शरीर अपने बच्चों के वतन लौटने का इंतजार करते रहते हैं।

वृद्धाश्रम किसलिए

वृद्धाश्रम की प्रासंगिकता विषय पर संबोधित करते हुए शहर की प्रमुख समाजसेविका बबिता चैहान ने कहा कि वृद्धाश्रम इसलिए नहीं होने चाहिए कि बच्चे अपने मां-बाप को यहां छोड़ जाएं बल्कि ये इसलिए होने चाहिए ताकि जो लोग माता-पिता को साथ नहीं रखते, उन्हें यहां बुलाकर उनकी काउंसलिंग की जा सके। उन्होंने कई ऐसे उदाहरण पेश किए जिसमें उन्होंने खुद रामलाल वृद्धाश्रम में रह रहे कई बुजुर्गों के परिवारों को बुलाया और उनकी काउंसलिंग कर बुजुर्गों को बच्चों के साथ वापस घर भेजा। उन्होंने कहा कि हम विदेशों में एकल परिवारों से अपनी तुलना करना चाहते हैं, लेकिन वास्तव में हम मानसिक रूप से अभी उतने तैयार नहीं हैं। हमारे संस्कार वो नहीं हैं कि हम माता-पिता से अलग होकर खुश रह सकें।

करें तो क्या

बच्चों के साथ सामंजस्य विषय पर बोलते हुए समाजसेवी संजय मिश्रा ने कहा कि आज बुजुर्गों की हालत वो है कि आंखें साथ नहीं देतीं जिसके कारण वे पढ़ नहीं पाते, दूरदर्शन पर कार्यक्रम भी देखना कठिन होता है। आखिर करें तो क्या करें। जिन बच्चों के लालन-पालन में उनका सारा जीवन व्यतीत हो गया वे बच्चे अपने परिवार में ही व्यस्त हैं।

बुजुर्गों की देखभाल करें

कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि विधायक जगन प्रसाद गर्ग ने युवाओं की परिवार से नजदीकी को ही समस्या का समाधान बताया। लीड आगरा के अध्यक्ष डॉ. पार्थ सारथी शर्मा ने कहा कि बुजुर्गों के अनुभवों से युवा पीढ़ी को सीखना चाहिए। यह अनुभव ही युवाओं के लिए प्रगति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इस मौके पर मंचासीन वरिष्ठ अधिवक्ता हरीदत्त शर्मा, लीडर्स आगरा के संरक्षक सुरेश चंद गर्ग, कोषाध्यक्ष वंदना सिंह, अमरेंद्र जैन आदि ने भी अपने वक्तव्यों से बुजुर्गों की देखभाल और सम्मान के प्रति युवा वर्ग को झकझोरा। संचालन करते हुए लीड आगरा के महामंत्री एवं पूर्व पार्षद सुनील जैन ने लोगों से अपने माता पिता और दूसरे बुजुर्गों की देखभाल करने का आग्रह किया।

माता-पिता, बुजुर्गों की सेवा का लिया प्रण
कार्यक्रम में वक्ताओं और अतिथियों ने कहा कि प्रत्येक मानव की प्राथमिकता सर्वप्रथम अपने माता-पिता की देखभाल, सम्मान होनी चाहिए। उन्हें आहत या अनदेखी नहीं करनी चाहिए। यदि वे संतुष्ट रहेंगे तो उनके आशीर्वाद से ही हमारा आगत भविष्य सुखमय हो जाएगा। अतः आज से ही हम प्रण लें कि माता-पिता या किसी भी वृद्ध का दिल नहीं दुखाएंगे, उन्हें उचित सम्मान देंगे। हरेक मानव का जन्म ही एक न एक दिन बुजुर्ग होने के लिए हुआ है। किसी पर आश्रित होना ही है। अतः यह अहसास नहीं होने देना है कि वे वृद्ध हो गए हैं बल्कि उनके मनोबल को उंचा उठाना है।

लीडर्स आगरा करेगी प्रयास
- संयुक्त परिवार समाप्त नहीं होने चाहिए।
- बच्चे अगर बाहर रह भी रहे हैं तो सप्ताह में एक बार घर आकर अपने माता-पिता के साथ समय बिताना चाहिए।
- स्कूलों में नैतिक शिक्षा और सामाजिक पाठयक्रम को और मजबूत बनाना चाहिए।
- वृद्धाश्रम स्थाई न होकर, अस्थाई होने चाहिए।

फेसबुक से कनेक्ट हुईं युवा चिकित्सक
लीडर्स आगरा की ओर से आयोजित यह कार्यक्रम लोगों को झकझोरने वाला रहा। ग्वालियर की दो युवा चिकित्सक फेसबुक पर लीडर्स आगरा के बुजुर्गों को समर्पित इस कैंपेन से इतनी प्रभावित थीं, कि वे ग्वालियर से आगरा आ पहुंचीं। ग्वालियर की डॉ. हिमानी और डॉ. सुमन इस कार्यक्रम से जुड़ने ग्वालियर से आगरा आई थीं। उन्होंने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी फेसबुक से हासिल हुईं थी और इसके विषय को देखते हुए वह भावनात्मक रूप से इससे जुड गईं।

यह रहे मौजूद
इस अवसर पर विजय जैन, अनिरूद्ध भदौरिया, कृष्णा माथुर, सुधीर शर्मा, राजकुमार गुप्ता, प्रीति सोनी, शिखा जैन, रिंकी सविता, अंजलि गुप्ता, ओमप्रकाश मेडतवाल, वीरेंद्र मेडतवाल, राहुल जैन, उल्लास दौनेरिया, प्रवीणा राजावत, राहुल जैन, अंजना कुलकर्णी आदि मौजूद थे।