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क्या आप जानते हैं कि भगवान गणेश को स्त्री बनना पड़ा था, पढ़िए अनकही कहानी

पुराणों में भगवान गणपति के भी स्त्री रूप का वर्णन है। ज्योतिषाचार्य से जानिए पूरी कहानी।

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आगरा

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suchita mishra

Aug 14, 2019

Ganesh Chaturthy

Ganesh Chaturthy

आपने कहानियों में भगवान विष्णु के मोहिनी रूप से लेकर तमाम देवताओं के स्त्री रूप के बारे में सुना और पढ़ा होगा। लेकिन गणपति जी के स्त्री रूप के बारे में शायद ही सुना हो। ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र का कहना है कि धर्मोत्तर पुराण में प्रथम पूज्य भगवान गणेश के भी स्त्री रूप का वर्णन है। उस रूप को विनायकी के नाम से जाना जाता है। वहीं वन दुर्गा उपनिषद में गणेश जी के स्त्री रूप को गणेश्वरी का नाम दिया गया है। आज बुधवार विशेष में ज्योतिषाचार्य से जानते हैं कि आखिर क्यों गणपति को लेना पड़ा था स्त्री रूप?

ज्योतिषाचार्य डॉ. अरविंद मिश्र का कहना है कि गणपति के विनायकी रूप के पीछे एक रोचक कहानी प्रचलित है। एक बार अंधक नाम के दैत्य ने जबरन माता पार्वती को अपनी अर्धांगिनी बनाने की कोशिश की, ऐसे में मां पार्वती ने सहायता के लिए अपने पति शिव जी को बुलाया। दैत्य से माता पार्वती की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने अपना त्रिशूल उठाया और उसके आर-पार कर दिया। लेकिन अंधक की मृत्यु नहीं हुई बल्कि त्रिशूल के प्रहार से उसके रक्त की एक-एक बूंद से राक्षसी अंधका का निर्माण होता चला गया।

यह देख माता पार्वती को एक बात तो समझ में आ गई कि हर एक दैवीय शक्ति के भीतर दो तत्व मौजूद होते हैं। पहला पुरुष तत्व जो उसे मानसिक रूप से सक्षम बनाता है और दूसरा स्त्री तत्व, जो उसे शक्ति प्रदान करता है। इसके बाद माता पार्वती ने उन सभी देवियों को आमंत्रित किया जो शक्ति का ही रूप हैं। उनके बुलाने पर हर दैवीय ताकत स्त्री रुप में वहां उपस्थित हो गईं और अंधक दैत्य के खून गिरने से पहले ही उसे अपने भीतर समाने लगीं, जिसके कारण राक्षसी अंधका का उत्पन्न होना कम हो गया। लेकिन इस प्रयास के बावजूद अंधक के गिरते हुए रक्त को खत्म करना असंभव हो रहा था। तब मां की रक्षा करने व अंधक को मारने के लिए भगवान गणेश ने स्त्री रूप लिया। विनायकी के रुप में प्रकट होकर गणेशजी ने अंधक का सारा रक्त पी लिया। इस तरह से गणेश समेत सभी दैवीय शक्तियों की मदद से अंधका का सर्वनाश संभव हो सका।

शास्त्रों में भगवान गणेश के स्त्री रूप का वर्णन हूबहू माता पार्वती जैसा है। फर्क सिर्फ इतना है कि उनका सिर गणेश जी की तरह ही ‘गज के सिर’ से बना है। गणेश जी के इस रूप को सबसे पहले 16वीं सदी में पहचाना गया। उनका यह स्वरूप विनायकी नाम से जाना जाता है।