28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Radha Ashtami 2017: कान्हा को भगवान श्रीकृष्ण बनाने वाली शक्ति का नाम है राधा

कृष्ण के जीवन को बनाने वाली, उनके जीवन की स्वामिनी थीं राधारानी।

3 min read
Google source verification

आगरा

image

suchita mishra

Aug 29, 2017

radha ashtami 2018

radha ashtami 2017

कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक 15 दिनों बाद भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधारानी का जन्म हुआ था। इस दिन को राधाष्टमी कहा जाता है। हालांकि कुछ विद्वानों का मत है कि वे कृष्ण से 8 साल बड़ी थीं। लेकिन इन बातों से अलग हटकर यहां समझने वाली बात ये है कृष्ण जन्मोत्सव को तो ब्रज सहित कई राज्यों में भी धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन राधाष्टमी की धूम मुख्यत: ब्रज क्षेत्र तक ही सीमित है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हम आज भी राधारानी के किरदार को नहीं जानते। आइए आज हम आपको राधारानी की शक्तियों से परिचित कराते हैं।

Must Read- 29 अगस्त को है राधाष्टमी, जानें व्रत, पूजा विधि, कथा और व्रत के महत्व के बारे में

कन्हैया से लेकर कृष्ण और द्वारकाधीश बनने तक उनके तमाम किरदार सामने आए। कभी नटखट बालक कन्हैया मटकी फोड़ते तो कभी द्वारका में बैठकर ही सच्ची दोस्ती निभाकर सुदामा की नगरी बसा देते। वहीं कृष्ण का दिया गीता का ज्ञान आज के परिपेक्ष्य में भी सार्थक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि नटखट कान्हा को भगवान श्रीकृष्ण बनाने का श्रेय किसे जाता है? राधा को... बेशक आपको सुनने में थोड़ा अजीब लग रहा होगा क्योंकि राधा तो उनसे बचपन में ही अलग हो गई थीं, लेकिन इसकी वजह हम आपको बताते हैं।

अध्ययन के मुताबिक कृष्ण ब्रज क्षेत्र में मात्र 17 वर्ष की उम्र तक ही रहे जबकि उन्होंने अपना जीवन 125 से अधिक वर्षों तक जिया। 17 साल की उम्र में उन्होंने तमाम राक्षसों का वध कर दिया था। कंस को मार गिराया था। गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की थी। इसी समय में उनको राधारानी से प्रेम हुआ। राधा रानी के प्रति उनका प्रेम उनकी ताकत था, समर्पण था और विश्वास था। राधारानी को वे अपने जीवन की स्वामिनी का दर्जा दिया करते थे। यदि राधारानी उन्हें किसी कार्य को करने के लिए मना कर दें तो कृष्ण कभी उसे टाल नहीं सकते थे। कृष्ण हमेशा कहा करते थे कि राधा मेरी स्वामिनी मैं राधे का दास। जनम-जनम मोह दीजिए वृंदावन को पास।

इन लाइनों से आप समझ सकते हैं कि राधा और वृंदावन दोनों उनके लिए कितने खास थे। वे कभी जीवन में इन्हें छोड़ने की कल्पना नहीं कर सकते थे। लेकिन शक्ति का अवतार राधारानी हमेशा से ही कृष्ण के संपूर्ण व्यक्तित्व को अच्छे से समझती थीं। वे हमेशा से जानती थीं कि कृष्ण की क्षमताएं सिर्फ ब्रज तक ही सीमित नहीं हैं। वे शक्तियों और क्षमताओं का अथाह सागर हैं। उन्हें अपनी शक्तियों का उदाहरण समय—समय पर प्रस्तुत करना होगा तभी युगों—युगों तक कृष्ण का वर्चस्व रहेगा।

यही कारण है कि 17 वर्षों बाद जब कृष्ण का ब्रजधाम छोड़ने का समय आया तो वे स्वयं को तैयार नहीं कर पा रहे थे, क्योंकि ये समय उनकी कल्पना से परे था। वे ब्रजवासियों और राधारानी से बेहद प्रेम करते थे। राधा उनके रोम रोम में बसती थीं। उनसे अलग होने की बात वे कल्पना भी नहीं सोच सकते थे। लेकिन फिर भी उन्होंने ब्रजधाम इसलिए छोड़ पाया क्योंकि उन्हें इसके लिए राधारानी ने उन्हें प्रोत्साहित किया। यदि उस समय राधारानी उन्हें रोकना चाहतीं तो बड़े आराम से रोक सकती थीं क्योंकि कृष्ण उनका कहा कभी नहीं टालते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

उस समय राधारानी ने उन्हें जीवन में समभाव अपनाने का पहला पाठ पढ़ाया। राधारानी ने अपने प्रेम को शारीरिक नहीं बल्कि मानसिक और रोम रोम में बसने वाली वो सच्ची ताकत बनाया जो अंतिम समय तक कृृष्ण के साथ, न रहते हुए भी रही। राधा रानी ये भली भांति जानती थीं कि ब्रज में रहकर कृष्ण सिर्फ राधा और ब्रज तक ही सीमित रह जाएंगे। इसलिए मन में अथाह कष्ट होने के बावजूद, ये जानने के बावजूद कि वे शायद अब कन्हैया को कभी न देख पाएं, उन्होंने खुद को एक मजबूत महिला के तौर पर दृढ बनाया और कन्हैया को रोकने के बजाय वहां से हमेशा के लिए जाने दिया।

इसके बाद ही कान्हा महाभारत में गीता के उपदेशक, द्वारका में द्वारकाधीश बन सके। कौरवों की भारी भरकम सेना के उपर पांच पांडवों की जीत सिर्फ उनकी सूझबूझ का ही नतीजा थी। राधा के साथ न होने के बावजूद कृष्ण हर पल उनके प्रेम, उनके त्याग को महसूस करते रहे। इतने वर्षों का उनका ये प्रेम आत्मा का प्रेम था, उनकी ताकत था जो समय समय पर उन्हें नए कर्मों को करने के लिए प्रेरित करता था। जिसे सिर्फ वो और राधा ही महसूस कर सकते थे। कृष्ण के दर्द की पीड़ा कैसे ब्रज में बैठी राधा महसूस करती थीं, ये सिर्फ कृष्ण ही जानते थे। यही कारण था कि तमाम रानियां होने के बावजूद राधारानी का दर्जा वे किसी को नहीं दे सके। राधा अंतिम समय तक उनके जीवन उनके किरदार की कर्ताधर्ता रहीं, स्वामिनी रहीं। कृष्ण ने अपने नाम से पहले राधा का नाम जोड़ दिया। यदि आप कृष्ण के किरदार से प्रभावित हैं या उन्हें अपना भगवान मानते हैं तो आपको राधारानी के साथ ही उन्हें याद करना होगा क्योंकि जहां राधा होंगी वहां कृष्ण की मौजूदगी जरूर मिलेगी।