आगरा। बुजुर्ग कवि गिरीश अश्क सामान्य जन पर कविता लिखते हैं। आम आदमी उनकी कविताओं के केन्द्र में रहता है। विश्व कविता दिवस पर उन्होंने पत्रिका के माध्यम से एक कविता साहित्यप्रेमियों को समर्पित की है। कवित इस प्रकार है-
कांपती है सड़क लड़खड़ाते हैं लोग
मौत के खौफ से थरथराते हैं लोग
चंद चेहरे यहां चांदनी से पुते
मुट्ठियां खींचकर बड़बड़ाते हैं लोग
पीढ़ियों का लहू जर्द बहता रहा
आदमी जुल्म दर जुल्म सहता रहा
सींकचे में फँसे फड़फड़ाते हैं लोग।
वे अहिंसा की घुट्टी पिलाते रहे
भाषणों का मलीदा खिलाते रहे
धर्म हुक्का यहां गुड़गुड़ाते हैं लोग।