
अंबाजी मंदिर
- राजेन्द्र धारीवाल
पालनपुर. बनासकांठा जिले की दांता तहसील में अरावली पर्वतश्रृंखला में अंबाजी स्थित सदियों पुराना व भारत के शक्तिपीठों में शामिल अंबाजी माता का मंदिर लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केन्द्र है।
मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है बल्कि शुद्ध स्वर्ण से निर्मित वीसा यंत्र को मुकुट एवं चुनरी से श्रृंगारित करके सवारी पर आरूढ अंबाजी माता की मूर्ति होने का आभास कराया जाता है। मंदिर में अखंड ज्योत भी जलती है। माताजी के यंत्र स्थान को खुली आंखों से देखना निषेध है, इस कारण पुजारी भी अपनी आंखों पर पट्टी बांधकर ही यंत्र की पूजा करते हैं। पिछले करीब 150 वर्षों से पाटण जिले के सिद्धपुर के मानस गोत्र के ब्राह्मण परिवार की ओर से अंबाजी माता के मंदिर में यंत्र की पूजा करते हैं।
सप्ताह में प्रत्येक दिन अलग सवारी
अंबाजी माता की पूजा सप्ताह में प्रत्येक दिन अलग होती है। रविवार को बाघ पर, सोमवार को नंदी पर, मंगलवार को शेर पर, बुधवार को एरावत पर, गुरुवार को गरुड़ पर, शुक्रवार को हंस पर व शनिवार को हाथी पर सवारी करते हुए अंबाजी माता दिखाई देती हैं।
गिरा था सती का हृदय
पौराणिक मान्यताओं व कथाओं के अनुसार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ में अपने दामाद भगवान महादेव को निमंत्रण नहीं दिया। सती (पार्वती) को जानकारी मिलने पर भगवान महादेव की ओर से इनकार करने पर भी वह यज्ञ स्थल पर पहुंची। अपमान होने के कारण वह यज्ञकुंड में कूद गई। भगवान महादेव को पता लगने पर उन्होंने वहां पहुंचकर सती की देह को निकालकर कंधे पर रख तांडव शुरू किया। भगवान विष्णु ने सृष्टि के विनाश की आशंका के चलते सुदर्शन चक्र छोड़ा, जिससे सती के शरीर के टुकड़े व शरीर के अंगों पर धारण आभूषण गिरे और उन 51 स्थानों पर शक्तिपीठ का निर्माण हुआ। अंबाजी में सती का हृदय गिरा और यह भी शक्तिपीठ बना। यह स्थान सदियों से लोगों की आस्था व श्रद्धा का स्थान बना हुआ है।
भगवान श्रीकृष्ण का हुआ था मुंडन
पौराणिक कथाओं के अनुसार अंबाजी के मूल स्थान गब्बर पर पीपल के पेड़ के नीचे भगवान श्रीकृष्ण का मुंडन करवाया गया था। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान राम भी अनुज लक्ष्मण के साथ वनवास के दौरान देवी सीता की तलाश में अंबाजी पहुंचे और दोनों ने अंबाजी माता का आशीर्वाद लिया था।
358 स्वर्ण कलश से सुशोभित है मंदिर
अंबाजी मंदिर का जीर्णोद्धार कार्य वर्ष 1975 में शुरू हुआ। लाखों रुपए के खर्च से समग्र मंदिर परिसर का कायाकल्प कर विशाल मंदिर का निर्माण करवाया गया। मंदिर 358 स्वर्ण कलश से सुशोभित है। मंदिर के शिखर को स्वर्णजडि़त करने का कार्य निरंतर जारी है, श्रद्धालुओं की ओर से आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्र्रस्ट को स्वर्ण दान किया जा रहा है।
Published on:
17 Oct 2020 12:42 am
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