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60 पार की उम्र होने के बावजूद कोरोना योद्धा के रूप में मैदान में उतरे चिकित्सक

ऐसे होते हैं देश के असली 'हीरोÓ -डॉक्टर डे पर विशेष

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60 पार की उम्र होने के बावजूद कोरोना योद्धा के रूप में मैदान में उतरे चिकित्सक

60 पार की उम्र होने के बावजूद कोरोना योद्धा के रूप में मैदान में उतरे चिकित्सक

अहमदाबाद. सरकारी अस्पतालों से वे डॉकटर के पद से सेवा निवृत हो चुके हैं लेकिन कोरोना विपदा में जब देश ने उन्हें पुकारा तो वे एक बार फिर दौड़ पड़े अस्पतालों की तरफ। उन्होने अपने बेजोड़ अनुभव के बल पर ना केवल कोरोना को हराया बल्कि खुद भी इस दौरान कोरोना से ग्रसित हुए। ठीक होते ही एक बार फिर भिड़ गए कोरोना से। उन्हें ये भी भालिभांति पता है कि उम्र के इस पड़ाव में कोरोना का संक्रमण लगने का खतरा काफी बढ़ जाता है लेकिन समाज सेवा के सामने यह डर बहुत कम लगता है। इन कोरोना योद्धाओं में तीन चिकित्सक तो ऐसे हैं जिनकी आयु 64 से लेकर 67 वर्ष है। दो चिकित्सक कोरोना के संक्रमण का सामना भी कर चुके हैं।
एशिया के सबसे बड़े अस्प्ताल (सिविल अहमदाबाद) में 16 वर्षों तक चिकित्सा अधीक्षक के रूप में सेवा दे चुके डॉ. एम.एम. प्रभाकर (65) की योग्यता से सरकार भी भलिभांति परिचित है। ऑर्थोपेडिक सर्जन के रूप में श्रेष्ठ चिकित्सकों में शुमार डॉ. प्रभाकर सेवा निवृत हो गए थे। अब कोरोना काल में सरकार ने उनके अनुभव का लाभ उठाया है। डॉ. प्रभाकर ने इससे पहले भी अस्पताल की इमरजेंसी में आतंकवादी हमले, सूरत में प्लेग और कच्छ में भूंकप के दौरान नोडल ऑफिसर के रूप में सेवाएं दी हैं। डॉ. प्रभाकर को अब सिविल अस्पताल के कोरोना वार्ड के ऑफिसर स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) के रूप में जिम्मेदारी सौंपी है। शुरुआत में इस हॉस्पिटल में 1100 से भी अधिक मरीज भर्ती हो चुके हैं। लेकिन फिलहाल अस्पताल में सिर्फ 266 कोरोना के मरीज हैं।

67 की आयु में भी पूरी तरह से एक्टिव

शहर के इंस्टीट्यूट ऑफ किडनी डिसिज एंड रिसर्च सेंटर (आईकेडीआरसी) में किडनी विशेषज्ञ डॉ. पंकज शाह (67) ने कोरोना काल में छुट्टी नहीं ली है। सेवा निवृत होने के बावजूद भी वे नियमित अस्पताल आते रहे हैं। उनके परिवार में उनके बेटे डॉ. हर्ष शाह, बहू डॉ. आइशा शाह भी चिकित्सक के रूप में कोरोना काल में सेवा देते रहे हैं।

कोरोना संक्रमण को झेल चुके हैं ये योद्धा
शहर के रखियाल क्षेत्र स्थित अस्पताल के चिकित्सक राजूभाई एच. शाह (64) को पिछले दिनों कोरोना का संक्रमण लगा था। 18 दिन तक शहर के एसवीपी अस्पताल में उपचार लेने के बाद फिर से अपना काम संभाल लिया।
वे प्रतिदिन 12 से 15 घंटे तक काम करते हैं और 500 से अधिक मरीजों को देखते हैं। वे आज भी जरूरतमंदों से फीस नहीं लेते हैं। ओपीडी के दौरान उनकी दवाई देने के साथ बीस रुपए शुल्क है।

कोरोना संक्रमण ठीक होने के बाद फिर से संभाला काम
शहर के मनपा संचालित एल.जी. अस्पताल के प्रोफेसर (सर्जरी विभाग) डॉ. प्रशान्त मुकादिम (56) को गत मई माह में कोरोना का संक्रमण लगा था। पूर्व में बाईपास सर्जरी और मधुमेह जैसी समस्या से पीडि़त डॉ. मुकादिम का कहना है कि कोरोना का उपचार एसवीपी अस्पताल में किया गया। दस से बारह दिनों में वे ठीक हो गए और उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिल गई। कुछ दिनों आराम के बाद फिर से काम शुरू कर दिया है। वे फिर से नियमित मरीजों को देख रहे हैं और ऑपरेशन भी करने लगे हैं।

फोन पर भी दिया मार्गदर्शन
शहर के मेमनगर इलाके में डॉ. प्रवीण गर्ग (फिजिशियन) ने कोरोना को ध्यान में रखकर फोन पर भी मागदर्शन दिया। डॉ. गर्ग का कहना है कि कोरोना की शुरुआत के दौरान अस्पताल बंद रहने लगे थे। उस दौरान सैकड़ों मरीजों को फोन पर बिना किसी शुल्क के विविध बीमारियों के लिए मार्गदर्शन दिया।