19 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

यहां होती है ५४२ प्रकार के धान की खेती

Paddy Research Center at Dabhai in Vadodara District, Cultivate, Vadodara News, Gujrat News

2 min read
Google source verification
यहां होती है ५४२ प्रकार के धान की खेती

यहां होती है ५४२ प्रकार के धान की खेती

वडोदरा. प्राचीन दर्भावति नगरी अर्थात आज का डभोई कभी घर उपयोग की तिजोरी बनाने के गृह उद्योग के लिए प्रसिद्ध था और शायद अभी भी, लेकिन ज्यातातर लोगों को शायद पता नहीं कि डभोई की बोडेली रोड पर एक ८० बीघा जमीन पर फैला विशाल सरकारी खेत है। उससे आगे डांगर शोध केन्द्र के रूप में आणंद कृषि विश्वविद्यालय की निगरानी में फिलहाल कार्यरत इस खेत में मानसून के दौरान देश के विभिन्न प्रदेशों में होने वाले ५४२ प्रकार के धान छोटी-छोटी क्यारियों में उगाई जाती है, जिससे गुजरात में उसकी अनुकूलता की जांच की जा सके।


पूर्व महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ ने वर्ष १९३६ में स्थापित डभोई का यह मॉर्डल फार्म आज भी धान शोध केन्द्र के रूप में कार्यरत है। करीब ८५ वर्ष से कार्यरत इस धान शोध केन्द्र में धान व मूंग की फसल पर शोध किया जाता है।


अब नर्मदा योजना का पानी भी मिलने लगा है। शोध केन्द्र के सहायक शोध विज्ञानिक डॉ. रामजी चोटलिया के अनवुसार निगम की इस सुविधा के तहत इस क्षेत्र के किसानों को धान, गेहूं एवं चना आदि फसलों के प्रदर्श प्लॉट निशुल्क आवंटित करके सुधारी गई खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।
उनका कहना है कि इस केन्द्र का मुख्य उद्देश्य शोध करके धान की अच्छी किस्म पैदा विकसित करना है। छोटी-छोटी क्यारियों में देश के विभिन्न प्रदेशों की धान उगाकर गुजरात के वातावरण में उसके अनुकूल फूट, पौधे की ऊंचाई, रोग प्रतिरोधक करने की शक्ति, दाने का प्रमाण, फसल का समय जैसे सूक्ष्म निरीक्षण करते हैं। उनकी तुलना गुजरात की प्रचलित किस्म के साथ करके फायदेमंद किस्म की वुबाई की सिफारिश करते हैं और लाभप्रद किस्म का बीज तैयार किया जाता है।


इस केन्द्र में धान की जीएआर.१३ (गुजरात आणंद राइस १३) किस्म विकसित की गई है, जो किसानों में लोकप्रिय बै। इसका प्रमाणिक बीज प्राप्त करने के लिए गुजरात ही नहीं, अपितु पड़ोसी मध्यप्रदेश के किसान भी पहले से ही पंजीकरण कराते हैं। इस प्रकार की धान की पैदावार प्रति हेक्टेयर ६ से ८ हजार किलोग्राम होता है, जबकि परम्परागत किस्म की धान की पैदावार ३ से ४ हजार किलो होती है।

शोध में लगते हैं ८-१० वर्ष


उन्होंने बताया कि एक किस्म के शोध में ८-१० वर्ष का समय लगता है। फसल, पानी की विभिन्न पद्धति के तहत परीक्षण करना पड़ता है। कृषि संस्था, प्रयोगशील किसानों के निरीक्षण लेने पड़ते हैं। वातावरण की अनुकूलता की जांच करनी पड़ती है। इस सभी कार्यों में समय, सतर्कता एवं वैज्ञानिक जानकारियां एकत्रित की जाती है। इसलिए एक नई किस्म विकसित करने में ८-१० वर्ष का समय लगता है। आणंद कृषि यूनिवर्सिटी ने गत वर्ष धान की जीएआर.१४ (गुजरात आणंद राइस १४) विकसित की है, जिसके शोध में इस केन्द्र का योगदान रहा है। एक महिसागर नाम की किस्म विकसित की गई है, जिसको अच्छा सहयोग किसानों ने दिया है। इस केन्द्र की ओर से मूंग के संबंध में भी शोध किए गए हैं।