
भुज. कच्छ जिले के भुज में गुजरात का प्रथम और तेरापंथ धर्मसंघ का 161वां मर्यादा महोत्सव में शुक्रवार को आचार्य महाश्रमण ने दीक्षा समारोह में भुज के मुमुक्षु केविन को दीक्षा प्रदान की। इसके साथ ही दीक्षार्थी केविन का नामकरण मुनि कैवल्यकुमार किया गया।
आचार्य के महामंत्रोच्चार के साथ दीक्षा समारोह का शुभारंभ हुआ। मुमुक्षु कल्प और मुमुक्षु प्रीत ने दीक्षार्थी केविन का परिचय दिया। पारमार्थिक शिक्षण संस्था की ओर से मोतीलाल जीरावला ने दीक्षार्थी के आज्ञा पत्र का वाचन किया। उस आज्ञा पत्र को दीक्षार्थी केविन के पिता शक्तिभाई आदि ने आचार्य को भेंट किया।
दीक्षार्थी केविन ने भी दीक्षा से पूर्व आचार्य के समक्ष अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। इसके बाद आचार्य ने कहा कि जीवन में धर्म की महिमा बताई गई है। अहिंसा, संयम और तप धर्म है। इस धर्म की आराधना गृहस्थ जीवन में भी एक सीमा तक हो सकती है, परन्तु इस धर्म की विशिष्ट आराधना एक साधु या अनगार कर सकता है। अनगार वह होता है, जिसका अपना कोई घर नहीं होता, आगार नहीं होता, साधु संयोग से विप्रमुक्त हो जाता है। भिक्षा से जीवन चलाने वाला हो जाता है।
आचार्य ने दीक्षार्थी केविन के माता-पिता, दादा आदि को सम्मुख बुलाकर मौखिक स्वीकृति भी ली। दीक्षार्थी के परिजनों से मौखिक स्वीकृति लेने के बाद दीक्षार्थी के भावनाओं का अंतिम परीक्षण भी किया। इसके बाद आचार्य ने दीक्षा के संस्कारों का शुभारंभ आर्षवाणी का उच्चारण करते हुए दीक्षा की प्रक्रिया प्रारंभ की। आर्षवाणी के साथ तीन करण-तीन योग सर्व सावद्य योगों का त्याग कराया तो दीक्षार्थी केविन ने साधुत्व की दीक्षा ग्रहण कर ली।
नवदीक्षित साधु के केश लुंचन के संस्कार को स्वयं आचार्य ने अपने हाथों से संपन्न किया। इसके बाद आचार्य ने रजोहरण प्रदान करने की प्रक्रिया को भी पूर्ण किया। दीक्षार्थी केविन को आचार्य ने साधुत्व दीक्षा प्रदान करने के बाद नामकरण करते हुए नया नाम मुनि कैवल्यकुमार प्रदान किया। आचार्य ने नवदीक्षित साधु को साधुत्व जीवन की विविध प्रेरणाएं प्रदान की। नवदीक्षित मुनि को शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए बहुश्रुत परिषद के सदस्य मुनि दिनेशकुमार का संरक्षण सौंपा।
Published on:
07 Feb 2025 10:18 pm
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