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चंद्रयान-2 मिशन के लिए भारत तैयार, इसरो का चंद्रमा लैंडिंग के लिए परीक्षण शुरू

चंद्रयान मिशन टू के लिए इसरो परीक्षण शुरू कर चुका है। इसरो की चंद्रयान-2 को 2017-18 में प्रक्षेपित करने की योजना है।

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Dhirendra Kumar Mishra

Nov 12, 2016

Isro starts tests moon lander

Isro starts tests moon lander

अहमदाबाद. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-2 मिशन के लून लैंडर पर परीक्षण शुरू कर दिए हैं। इसरो के अध्यक्ष एएस किरण कुमार ने कहा कि कर्नाटक के चल्लाकेरे स्थित केंद्र में परीक्षण जारी है जहां महत्वाकांक्षी चंद्रयान-2 मिशन के लैंडिंग के लिए छद्म चंद्र गड्ढे (सिम्युलैटेड लुनार क्रेटर) बनाए गए हैं।


परीक्षण जोखिम टालने के लिए
कुमार ने बताया कि चंद्रयान-2 के उपकरणों और संवेदकों की परख के लिए चंद्रमा की सतह की भांति ही जमीन पर गड्ढे बनाए गए हैं। उन्होंने अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी में एक कार्यक्रम दौरान कहा कि परीक्षण के लिए चल्लाकेरे के हमारे केंद्र में इस छद्म क्षेत्र में कुछ उपकरणों से लैस एक विमान को उड़ाया गया। ये परीक्षण हमारे जोखिम टालने एवं लैंडिंग अभ्यास का हिस्सा हैं। लैंडर के नीचे (चंद्रमा पर) उतरने की उम्मीद है। हमें यह पक्का कर लेना होगा कि यह यह उस जगह उतरे जहां बहुत ज्यादा ढलान न हो। ढलान होने पर लैंडर का एक पैर गड्ढे में फंस सकता है। इसमें एक परिक्रमक, लैंडर और रोवर शामिल हैं। वैज्ञानिक भारों के साथ परिक्रमक चंद्रमा का चक्कर लगाएगा। हाल ही में कुमार ने संकेत दिया था कि चंद्रयान-2 के 2017 और 2018 के बीच प्रक्षेपित किये जाने की संभावना है।


क्या है भारत का लून लैंडर
लून लैंडर को इसरो ने विकसित किया गया है। यह चंद्रयान-2 मिशन का हिस्सा है। लून लैंडर पिछले चंद्रयान-1 मिशन का उन्नत संस्करण है जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान संगठन (इसरो) ने विकसित किया है। अभियान को जीएसएलवी प्रक्षेपण यान द्वारा प्रक्षेपण करने की योजना है। इस अभियान में भारत में निर्मित एक लूनर ऑर्बिटर (चन्द्र यान) तथा एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल होंगे। इस सब का विकास इसरो द्वारा किया जा रहा है।


लाभ :
इस अभियान से नई प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल तथा परीक्षण के साथ-साथ नए प्रयोगों को बढ़ावा मिलेगा। पहिएदार रोवर चन्द्रमा की सतह पर चलेगा तथा ऑन-साइट विश्लेषण के लिए मिट्टी या चट्टान के नमूनों को एकत्र करेगा। इन आंकड़ों को चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के माध्यम से पृथ्वी पर भेजा जायेगा।


चंद्रयान-2 का इतिहास :
12 नवम्बर 2007 को इसरो और रूसी अंतरिक्ष एजेंसी (रोसकोसमोस) के प्रतिनिधियों ने चंद्रयान-2 परियोजना पर साथ काम करने के एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। ऑर्बिटर तथा रोवर की मुख्य जिम्मेदारी इसरो ने अपने जिम्मे ली थी जबकि रोसकोसमोस लैंडर तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। भारत सरकार ने 18 सितंबर, 2008 को पीएम मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस अभियान को स्वीकृति दी थी। अंतरिक्ष यान के डिजाइन को अगस्त, 2009 में पूर्ण कर लिया गया, जिसमे दोनों देशों के वैज्ञानिकों ने अपना संयुक्त योगदान दिया था। तय योजना के अनुसान इसरो ने चंद्रयान -2 पेलोड को अंतिम रूप दिया। परंतु अभियान को जनवरी, 2013 में स्थगित कर दिया गया तथा अभियान को 2016 के लिये पुनर्निर्धारित किया। ऐसा इसलिए किया गया कि रूस लैंडर को समय पर विकसित नहीं कर सका। रोसकोसमोस को बाद में मंगल ग्रह के लिए भेज़े फोबोस-ग्रन्ट अभियान मे मिली विफलता के कारण चंद्रयान -2 से अलग कर दिया गया। उसके बाद भारत ने चंद्र मिशन टू को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का फैसला किया।


चंद्रयान-2 मिशन का स्वरूप :
चन्द्रमा, ऑर्बिटर, लैंडर तथा रोवर


मिशन अवधि :
ऑर्बिटर - 1 वर्ष
लैंडर - 14-15 दिन
रोवर - 14-15 दिन


अंतरिक्षयान की खासियत
निर्माता - इसरो
लॉन्च वजन - 3,250 किग्रा
पेलोड वजन - ऑर्बिटर 1,400 किग्रा
रोवर - 20 किग्रा


मिशन का आरंभ
प्रक्षेपण तिथि - 2017-18
रॉकेट - भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान
प्रक्षेपण स्थल - सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र




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