
डॉ. दर्शना जी. हिरपरा।
जूनागढ़ जूनागढ़ कृषि यूनिवर्सिटी में पीएचडी अध्ययन के दौरान मूंगफली में कृषि जैव प्रौद्योगिकी (बायोटेक्नोलॉजी) के क्षेत्र में नवीनतम शोध करने पर डॉ. दर्शना जी. हिरपरा को उत्कृष्ट डॉक्टरल थीसिस रिसर्च के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की ओर से जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार-2019 से सम्मानित किया गया है।
जैविक खेती और मौसम में आ रहे बदलाव की बाधाओं में यह अनुसंधान काफी उपयोगी होगा। भविष्य में किसानों तक पहुंचाने के लिए आवश्यक खेतों पर इस अनुसंधान का परीक्षण किया जाएगा। डॉ. दर्शना के अनुसार जूनागढ़ कृषि यूनिवर्सिटी के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सह आचार्य डॉ. एच.पी. गजेरा के मार्गदशन में पीएच.डी. की थीसिस को तैयार करने में तीन वर्ष लगे, जबकि इन दो उत्पादों के लिए जानकारी और डेटा एकत्र करने में कुल 7 वर्ष लगे।
उनकी अनुसंधान उपलब्धि जैव-प्रौद्योगिकी-नैनो प्रौद्योगिकी का कुशल उपयोग कर मूंगफली में सुकारा (सफेद कवक) रोग के खिलाफ प्रभावी जैविक नियंत्रण और पर्यावरण के अनुकूल नैनो उत्पादों को विकसित करने की थी। बदलती व प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों (अकाल, लवणता, कवकनाशी आदि) में भी फसल को बीमारी से बचाने में इस अनुसंधान से बचाव हो सकेगा।
कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन आईसीएआर की ओर से पिछले दिनों नई दिल्ली से आयोजित वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (ऑनलाइन) से केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्रसिंह तोमर, राज्यमंत्रियों पुरुषोत्तम रूपाला व कैलाश चौधरी की उपस्थिति में इस पुरस्कार से डॉ. दर्शना को सम्मानित किया गया। जूनागढ़ कृषि यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. वी.पी. चोवटिया ने डॉ. दर्शना को शुभकामनाएं देते हुए सफल मार्गदर्शन के लिए बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सह आचार्य डॉ. एच.पी. गजेरा व विभागाध्यक्ष डॉ. बी.एल. गोलकिया की सराहना की।
अनुबंधित कृषि का लाभ छोटे किसानों को भी मिले - तोमर
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (ऑनलाइन) के जरिए तोमर ने कृषि विकास में कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि आईसीएआर और कृषि विज्ञान केन्द्रों (केवीके) के वैज्ञानिकों को सुनिश्चित करना है कि अनुबंधित कृषि का लाभ छोटे किसानों को भी मिले। आयात पर निर्भरता घटाने, स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत बताते हुए उन्होंने कोविड-19 महामारी के चलते लागू लॉकडाउन के दौरान भी फसलों के रिकॉर्ड उत्पादन के लिए देश के किसानों की सराहना की।
अनुसंधान के जरिए पाम ऑयल का उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता, तिलहन की नई किस्में तैयार करने पर भी जोर देते हुए उन्होंने कहा कि दलहन उत्पादन में हम आत्मनिर्भरता हासिल करने के करीब हैं और उम्मीद है कि तिलहन के मामले में भी हम ऐसी ही सफलता को दोहराएंगे और खाद्य तेलों के आयात पर होने वाले खर्च में कमी ला पाएंगे।
Published on:
19 Aug 2020 10:43 pm

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