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समुद्र और रेगिस्तान के बीच आस्था का धाम कोटेश्वर महादेव मंदिर

पश्चिमी कच्छ की विशाल और वीरान धरती से गुजरने के बाद अरब सागर का नजारा मन को आकर्षित करता है। पूर्व दिशा में फैला समतल भूरा क्षितिज और पश्चिम में दिखाई देता विशाल नीला समुद्र इस स्थान को अलग पहचान देते हैं। समुद्र के किनारे स्थित मंदिर और आसपास का शांत वातावरण श्रद्धालुओं के साथ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है।
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Koteshwar Mahadev Temple A Sanctuary of Faith Between Sea and Desert

कोटेश्वर महादेव मंदिर

सावन का सत्कार : अरब सागर के किनारे भारत-पाक सीमा के निकट स्थित प्राचीन शिव मंदिर, धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक सौंदर्य भी खींचता है पर्यटकों को

राजेश भटनागर

अहमदाबाद. गुजरात के कच्छ जिले में भारत-पाकिस्तान सीमा के निकट अरब सागर के किनारे स्थित कोटेश्वर महादेव मंदिर आस्था, इतिहास और प्रकृति का अनूठा संगम है। पश्चिमी कच्छ के विशाल रेगिस्तान को पार करने के बाद जब सूखी और बंजर धरती का विस्तार समुद्र की अथाह नीली लहरों से मिलता है, तो इसी क्षितिज पर कोटेश्वर महादेव मंदिर आस्था के केंद्र के रूप में नजर आता है। धार्मिक महत्व के साथ यह स्थान प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन की दृष्टि से भी खास है।
पश्चिमी कच्छ की विशाल और वीरान धरती से गुजरने के बाद अरब सागर का नजारा मन को आकर्षित करता है। पूर्व दिशा में फैला समतल भूरा क्षितिज और पश्चिम में दिखाई देता विशाल नीला समुद्र इस स्थान को अलग पहचान देते हैं। समुद्र के किनारे स्थित मंदिर और आसपास का शांत वातावरण श्रद्धालुओं के साथ प्रकृति प्रेमियों को भी आकर्षित करता है।

रावण से जुड़ी है मंदिर की पौराणिक कथा

कोटेश्वर महादेव की कथा भगवान शिव के परम भक्त रावण से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता के अनुसार, रावण ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया था और उनसे शक्तिशाली शिवलिंग प्राप्त किया। रावण शिवलिंग को अपने साथ ले जा रहा था, लेकिन रास्ते में वह शिवलिंग उसके हाथ से गिरकर धरती पर स्थापित हो गया। कहा जाता है कि रावण को शिवलिंग उठाने से रोकने के लिए भगवान शिव ने उसके समान अनेक शिवलिंग प्रकट कर दिए। रावण असली शिवलिंग को पहचान नहीं सका और एक प्रतिकृति लेकर चला गया। मूल शिवलिंग वहीं रह गया और बाद में उसके चारों ओर कोटेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण हुआ।

एकांत में मिलता है प्रकृति और आस्था का अनुभव

अन्य प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग और धार्मिक स्थलों की तुलना में कोटेश्वर में पर्यटकों की भीड़ अपेक्षाकृत कम रहती है। यही कारण है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं को शांत वातावरण में पूजा-अर्चना और चिंतन का अवसर मिलता है। मंदिर के साथ समुद्र तट पर घूमना भी पर्यटकों के लिए खास अनुभव होता है। साफ मौसम में रात के समय उत्तर-पश्चिमी क्षितिज की ओर पाकिस्तान के कराची शहर की रोशनी की चमक भी दिखाई देने की बात कही जाती है। भारत की पश्चिमी सीमा के निकट होने के कारण यह दृश्य इस स्थान को और खास बनाता है।

पहुंचना आसान नहीं, सुविधाओं का भी अभाव

कोटेश्वर तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन के सीमित साधन उपलब्ध हैं। भुज से करीब 154 किलोमीटर दूर नारायण सरोवर तक दिन में दो बसें, सुबह और शाम चलती हैं। यही प्रमुख सार्वजनिक परिवहन विकल्प है। नारायण सरोवर से कोटेश्वर महादेव मंदिर की दूरी करीब 2 किलोमीटर है।
दूरस्थ क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहां ठहरने और खाने-पीने की सुविधाएं भी सीमित हैं। यदि बेहतर परिवहन, आवास और अन्य पर्यटक सुविधाएं विकसित की जाएं तो धार्मिक पर्यटन के साथ कच्छ के इस सीमावर्ती क्षेत्र में पर्यटन को भी बढ़ावा मिल सकता है।