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माधवपुर-घेड मेला बना वार्षिक सांस्कृतिक महाकुंभ का प्रतीक : शेखावत

गुजरात और पूर्वोत्तर भारत के 1600 कलाकारों ने एक साथ सांस्कृतिक प्रस्तुति दी, पोरबंदर जिले में आयोजित मेले में गुजरात व अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे उपस्थित अहमदाबाद. केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत ने कहा कि माधवपुर-घेड का मेला एक वार्षिक सांस्कृतिक महाकुंभ का प्रतीक बन चुका है जिसकी कल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी […]

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गुजरात और पूर्वोत्तर भारत के 1600 कलाकारों ने एक साथ सांस्कृतिक प्रस्तुति दी, पोरबंदर जिले में आयोजित मेले में गुजरात व अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे उपस्थित

अहमदाबाद. केंद्रीय संस्कृति व पर्यटन मंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत ने कहा कि माधवपुर-घेड का मेला एक वार्षिक सांस्कृतिक महाकुंभ का प्रतीक बन चुका है जिसकी कल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में की थी।
गुजरात के पोरबंदर जिले में माधवपुर घेड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय माधवपुर मेले में एक भारत-श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करते हुए गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल राज्यपाल (सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल) कैवल्य त्रिविक्रम परनायक उपस्थित रहे। यह आयोजन भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मणि के विवाह पर्व के उपलक्ष्य में हुआ। मेले में गुजरात और पूर्वोत्तर भारत के कुल 1600 कलाकारों ने एक साथ शानदार सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।
शेखावत ने कहा कि पिछले आठ वर्षों में इस मेले ने जो व्यापकता और भव्यता प्राप्त की है, वह गुजरात सरकार के प्रयासों का परिणाम है। यह मेला केवल श्रीकृष्ण-रुक्मणि के मिलन का उत्सव नहीं, बल्कि गुजरात और पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक संगम का प्रमाण है। माधवपुर की भूमि सदियों से संस्कृति के समागम की भूमि रही है और यह आयोजन बदलते भारत की सांस्कृतिक चेतना और विकसित भारत की दिशा का प्रतीक है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि आने वाले वर्षों में माधवपुर मेला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनेगा।
गुजरात के राज्यपाल देवव्रत ने कहा कि माधवपुर मेला न केवल सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है बल्कि उनके संरक्षण और संवर्धन का भी सशक्त माध्यम है। आने वाली पीढ़ी संस्कार, संस्कृति और परंपरा से जुड़ी रहे तो परिवार, समाज और राष्ट्र अधिक सशक्त व श्रेष्ठ बनेंगे।
अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ने कहा कि यह मेला धार्मिक, साहित्यिक और जनजातीय परंपराओं का संगम है। भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मणि के विवाह की पौराणिक कथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह मेला आज अरुणाचल प्रदेश से द्वारका तक की सांस्कृतिक यात्रा का प्रतीक बन चुका है।