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महात्मा गांधी ने वर्ष 1928 में अंतिम बार की थी गृह नगर पोरबंदर की यात्रा

छह बार किया था दौरा, मृत्यु के 14वें दिन अस्थियों का किया था विसर्जन

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महात्मा गांधी ने वर्ष 1928 में अंतिम बार की थी गृह नगर पोरबंदर की यात्रा

महात्मा गांधी की अस्थि विसर्जन के लिए पोरबंदर में अस्मावती घाट पर एकत्र हुए लोग।

श्रद्धा गोस्वामी

पोरबंदर. देश और दुनिया को सत्याग्रह का संदेश देने वाले राष्ट्रपिता सह पोरबंदर (सुदामापुरी) में जन्मे मोहनदास करमचंद गांधी (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी) की मृत्यु के 14वें दिन उनकी अस्थियों का पोरबंदर में समुद्र किनारे अस्मावती घाट पर विसर्जन किया गया था। पोरबंदर में जन्मे महात्मा गांधी की अस्थियां भी पोरबंदर के समुद्र में मिलने के साथ ही एक युग समाप्त हो गया।
तत्कालीन पोरबंदर राज्य के पूर्व दीवान (मुख्यमंत्री) करमचंद गांधी की चौथी पत्नी पुतलीबाई ने 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में एक बच्चे को जन्म दिया, वही मोहनदास करमचंद गांधी बाद में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बने। उस समय के रीति-रिवाज के अनुरूप 7 साल की उम्र में कस्तुरबा के साथ सगाई हुई। गांधीजी अपने परिजनों के साथ राजकोट पहुंचे और स्कूल के रिकार्ड के अनुसार 9 नवंबर 1876 को उन्होंने राजकोट के एक स्कूल में प्रवेश लिया। पोरबंदर छोडऩे के बाद गांधीजी ने 6 बार पोरबंदर का दौरा किया। 30 जनवरी 1948 को दिल्ली में प्रार्थना सभा से पहले ही नाथूराम गोडसे ने गोली चलाकर गांधीजी की हत्या कर दी। यह समाचार सुनकर पोरबंदर के लोग शोकमग्न हो गए। पोरबंदर के इतिहासकार नरोत्तम पलाण के अनुसार 12 फरवरी 1948 को उनकी अस्थियां एक कलश में पोरबंदर लाई गई थी।

काफी लोग हुए शामिल

पोरबंदर के रेलवे स्टेशन से अस्थि कलश को चांदी की पालखी में रखकर विभिन्न मार्गों से होते हुए अस्थि यात्रा पोरबंदर में समुद्र किनारे अस्मावती घाट पर पहुंची। अस्थि यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे। पोरबंदर हाईस्कूल के खादीधारी एक शिक्षक ने अस्मावती घाट पर गांधीजी का अस्थि कलश समुद्र में विसर्जित किया गया। उस समय समुद्र में ऊंची लहरें उठने के कारण एक नाव में रखकर कलश को समुद्र के बीच ले जाकर विसर्जित किया गया था।

पोरबंदर छोडऩे के बाद पहली बार विवाह करने लौटे

गांधीजी ने पोरबंदर छोडऩे के बाद विवाह करने के लिए पहली बार मई 1881 में पोरबंदर की यात्रा की और एक महीने तक रहे थे। दूसरी बार 12 मई 1888 को वे पोरबंदर पहुंचे। विलायत में अध्ययन करने के लिए जाने से पहले उस समय उन्होंने अपने काका से विचार-विमर्श किया था। तीसरी बार 1 दिसंबर 1901 में वे पोरबंदर पहुंचे। उस समय वे 5 दिन तक ठहरे और पोरबंदर के दरिया महल (वर्तमान में आरजीटी कॉलेज) में अतिथि बने थे। चौथी बार वे 22 से 26 जनवरी 1915 तक पोरबंदर में ठहरे। उस समय 25 जनवरी 1915 को वे वर्तमान की स्टेट लाइब्रेरी में एक सभा में शामिल हुए और उसी शाम को वे राजवाड़ी (वर्तमान में भारत मंदिर) में वनस्पति शास्त्री जयकृष्ण इंद्रजी से मुलाकात करने गए। 5वीं बार वे 1925 में पोरबंदर आए और यहां उन्होंने एक सभा को संबोधित किया। छठी बार वे 22 जनवरी 1928 को पोरबंदर पहुंचे। लोहाणा महाजन के रचनात्मक कार्यों में सहायता के लिए ठक्कर बापा को थैली अर्पित की। उस दिन रेलवे स्टेशन के सामने भाणजी लवजी घीवाला लोहाणा सेनेटोरियम में सभा की उन्होंने अध्यक्षता की थी।

कीर्ति मंदिर में सर्वधर्म प्रार्थना सभा आज

पोरबंदर में महात्मा गांधी के जन्म स्थान कीर्ति मंदिर की संचालन समिति के सदस्य सचिव सह उप कलक्टर के अनुसार गांधीजी के निर्वाण दिवस पर पोरबंदर के कीर्ति मंदिर में सोमवार को शाम 5 बजे सर्वधर्म प्रार्थना सभा होगी। उनके अनुसार कोरोना की सोशल डिस्टेंङ्क्षसग की गाइडलाइन के अनुरूप लोगों के लिए बैठक व्यवस्था की गई है।