
डोमिसाइल को लेकर मेडिकल विद्यार्थियों को राहत, सर्टिफिकेट व दाखिला रद्द करने का राज्य सरकार का निर्णय खारिज
अहमदाबाद. मेडिकल (एमबीबीएस) व डेन्टल (बीडीएस) पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए 10 वर्ष के डोमिसाइल के नियम की स्पष्टता को लेकर गुजरात उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला देते हुए कहा कि यदि माता-पिता 10 वर्षों से गुजरात में रहते हों और उनके स्थायी रूप से यहां रहने का आशय स्पष्ट होता हो तब विद्यार्थी का डोमिसाइल उसके माता-पिता के डोमिसाइल के आधार पर ही तय होगा।
न्यायाधीश जे. बी. पारडीवाला ने ऐसे मामले में मेडिकल व डेन्टल कॉलेज के विद्यार्थियों को राहत दी। दो महीने तक विभिन्न मेडिकल व डेंटल कॉलेजों में पढ़ाई के बाद मुस्कान तिवारी, श्रुति सिंह, विकल्प पंचाल व आशा त्रिपाठी नामक चार विद्यार्थियों के डोमिसाइल सर्टिफिकेट रद्द कर दिए गए और इसके आधार पर इन कॉलेजों में दाखिले को भी रद्द कर दिया गया।
न्यायालय ने राज्य सरकार के इन विद्यार्थियों के डोमिसाइल सर्टिफिकेट रद्द करने के निर्णय और इस आधार पर विद्यार्थियों के विभिन्न कॉलेजों में दाखिले के निर्णय को खारिज करते हुए इन विद्यार्थियों को राहत दी। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि इन विद्यार्थियों की मेडिकल व डेंटल की पढ़ाई जारी रखी जाए और संबंधित कॉलेजों में इनका दाखिला सुनिश्चित रखा जाए।
न्यायालय के मुताबिक इस मामले में चार याचिकाकर्ता विद्यार्थियों ने यदि लगातार दस वर्ष तक गुजरात में पढ़ाई नहीं की हो, लेकिन डोमिसाइल व इसके नियम के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि ये विद्यार्थी गुजरात का डोमिसाइल नहीं रखते।
न्यायालय ने कहा कि किसी कारण से यदि कोई विद्यार्थी राज्य के बाहर पढ़ाई करता हो और तब उस राज्य में उसके माता-पिता दस या इससे ज्यादा वर्षों से रहते हों, तब ऐसे में वहां का डोमिसाइल खत्म होने की बात नहीं कही जा सकती।
उच्च न्यायालय के इस फैसले से राज्य सरकार को झटका लगा है क्योंकि इस फैसले से व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
न्यायालय ने यह फैसला मितेश मराठे के फैसले के आधार पर डोमिसाइल के नियमों को स्पष्ट किया। इसमें यह कहा गया कि गुजरात में मेडिकल पाठयक्रमों में दाखिले को लेकर नियम 4(1-ए) में ऐसी कोई शर्त नहीं बताई गई है कि जिसमें विद्यार्थी लगातार दस वर्ष गुजरात में ही रहा हो। गुजरात के डोमिसाइल के स्टेटस के लिए इस नियम के तहत अन्य कोई शर्त या आवश्यक भी नहीं बताई गई है। जब कोई अतिरिक्त जरूरत के नियम न हो तब सरकार किसी पत्र या परिपत्र के आधार पर यह आवश्यकता नहीं तय की जा सकती।
इस मामले में सभी चार विद्यार्थियों के माता-पिता दस या इससे ज्यादा वर्षों से गुजरात के निवासी हैं और यहीं पर स्थायी होने की बात प्रतीत होती है। इसके अलावा इन विद्यार्थियों के अनियमितता से डोमिसाइल सर्टिफिकेट प्राप्त करने की भी बात सामने नहीं आती। सभी प्रकार की जांच के बाद इन्हें डोमिसाइल सर्टिफिकेट दिया गया। इन विद्यार्थियों ने वकील आदित्य भट्ट के मार्फत दायर याचिकाओं में कहा था कि इन सभी के माता-पिता दस वर्ष से ज्यादा समय से गुजरात में रहते हैं। इसलिए उन्हें गुजरात का ही निवासी माना जाना चाहिए।
Published on:
06 Dec 2018 12:29 am
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