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वडोदरा की दुकान का मुनाफा बापू को समाज सेवा के लिए भेजा जाता

गणतंत्र दिवस पर विशेष : रावपुरा में अब भी कार्यरत भारत उद्योग हाट, रविशंकर महाराज ने 1937 में किया था उद्घाटन वडोदरा. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शहर के रावपुरा में आज भी एक ऐसी दुकान है जिसके मालिक अपना घरेलू खर्च निकालते थे और बचा हुआ मुनाफा समाज सेवा के लिए गांधीजी को […]

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गणतंत्र दिवस पर विशेष : रावपुरा में अब भी कार्यरत भारत उद्योग हाट, रविशंकर महाराज ने 1937 में किया था उद्घाटन

वडोदरा. आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शहर के रावपुरा में आज भी एक ऐसी दुकान है जिसके मालिक अपना घरेलू खर्च निकालते थे और बचा हुआ मुनाफा समाज सेवा के लिए गांधीजी को भेजते थे। यह पहली निजी दुकान थी, जहां खादी की बिक्री होती थी। भारत उद्योग हाट नामक यह दुकान देश के खादी प्रेम और देशवासियों के आजादी के प्रति लगाव की साक्षी है।

26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत उद्योग हाट के बारे में जानना हर किसी को अच्छा लगेगा।

महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वदेशी उत्पादों को अपनाने की अपील की थी। इससे प्रेरित होकर छोटालाल मेहता और उनके दो पुत्रों धीरजलाल व सुमनचंद्र ने 1930-32 के दौरान वडोदरा में खादी बेचना शुरू किया। इसके बाद रावपुरा में 1937 में उन्होंने दुकान शुरू की। इस दुकान का उद्घाटन करने स्वयं रविशंकर महाराज आए थे। उस समय यह दुकान उचित मूल्य पर स्वदेशी खादी के लिए प्रसिद्ध थी।

1942 में गांधीजी की अपील पर हर जगह विदेशी वस्त्रों और वस्तुओं की होली जलने लगी तो यहां खादी खरीदने के लिए कतारें लग गईं।

दुकान मालिक छोटालाल समाज सेवा से जुड़े

बाद में छोटालाल मेहता ने अपना जीवन समाज सेवा के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया और गांधीजी के साथ चले गए। उनके बड़े पुत्र धीरजलाल मेहता का विवाह सौराष्ट्र के जेतपुर की प्रभा के साथ बारडोली में रविशंकर महाराज ने कराया था। इस अवसर पर गांधीजी भी उपस्थित थे, उन्होंने सभी को गुड़ खिलाकर मुंह मीठा कराया था। यह संस्मरण छोटालाल के परपोते पुलकित मेहता (71) और संजय मेहता (63) ने साझा किए।

एक दशक तक आज का हिस्सा भेजा जाता रहा

छोटालाल के प्रपौत्र के मुताबिक गांधीजी समेत कई लोग अक्सर भारत उद्योग हाट में आते थे। मेहता परिवार ने स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने के लिए कई अनोखे निर्णय लिए। वे अपनी दुकान से होने वाली आय में से घरेलू खर्च का हिस्सा निकालकर शेष राशि गांधीजी या उनकी सलाह पर आश्रम को भेज देते थे। लगभग एक दशक तक आय का एक हिस्सा इसी तरह भेजा जाता रहा। गांधीजी से इस बारे में पत्राचार भी हुआ।

दो परपोते चला रहे हैं दुकान

वडोदरा शहर में पुलकित और संजय आज भी यह दुकान चला रहे हैं। इस दुकान का किसी भी प्रकार का नवीनीकरण नहीं हुआ है। यह दुकान उसी स्थिति में चल रही है, जैसी पहले थी।