
फाइल फोटो।
Ahmedabad: वाहन दुर्घटनाओं में तिल्ली (स्प्लिन) की चोट आम बात बन गई है। अहमदाबाद महानगरपालिका संचालित एल.जी. अस्पताल में तिल्ली संबंधित उपचार के लिए आने वाले मरीजों में से 80 प्रतिशत सड़क हादसों के शिकार होते हैं और गंभीर स्थिति में अब तक 47 मरीजों की तिल्ली निकालनी पड़ी है।
अस्पताल के जनरल सर्जरी विभाग के डॉ. तपन शाह ने बताया कि एल.जी. अस्पताल में हाल ही में तिल्ली संबंधी दो केस सामने आए। एक 45 वर्षीय महिला को सड़क हादसे में पेट और पसलियों की चोट लगी। शुरुआती रिपोर्ट सामान्य रही, लेकिन दो घंटे में रक्तचाप गिरने पर तत्काल ऑपरेशन कर तिल्ली निकालनी पड़ी। वहीं 22 वर्षीय युवक रात में दुर्घटना के बाद आया, उसे पेट, सिर और चेहरे पर चोट थी। सीटी स्कैन व सोनोग्राफी से तिल्ली की चोट की पुष्टि हुई। चार दिन निगरानी और उपचार के बाद उसे स्थिर स्थिति में छुट्टी दी गई।पेट के बाएं हिस्से में तिल्ली का आकार भले ही मुट्ठी भर है लेकिन यह हमारे लिए काफी महत्वपूर्ण अंग है। इस अंग में 400 से 700 मिली रक्त संग्रहित रहता है। यह स्पंज जैसा अंग है और चोट लगने पर जल्दी फट जाता है। यदि गोल्डन ऑवर’ में उपचार न मिले तो अत्यधिक रक्तस्राव से जीवन संकट में पड़ सकता है।
डॉ. शाह ने बताया कि उनके 15 वर्षों के अनुभव में 500 से अधिक मरीज तिल्ली की चोट के साथ अस्पताल आए। इनमें से 80 फीसदी मरीज समय पर अस्पताल पहुंचे और इनमें से 90 से 95 फीसदी को दवाओं, निगरानी या ऑपरेशन के माध्यम से बचा लिया गया। अब तक 47 लोगों तिल्ली निकालनी पड़ी है, जो काफी गंभीर स्थिति में थीं। 5-10 फीसदी मामलों में गंभीर चोट या देर से आने के कारण मरीजों की मृत्यु हुई। उन्होंने कहा कि सड़क हादसों में तिल्ली की चोट अक्सर वाहन के स्टीयरिंग, स्कूटर या साइकिल हैंडल, रिक्शा के हैंडल से पेट पर चोट लगने से होती है। ऐसे में किसी भी चोट को हल्के में न लें और तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए ताकि गोल्डन ऑवर में उपचार से जीवन बचाया जा सके। एल.जी. अस्पताल में रोजाना 40-50 ओपीडी मरीजों में से 5-10 को भर्ती करना पड़ता है। इनमें महीनेभर में 15-20 मरीज तिल्ली की चोट के साथ पाए जाते हैं।
Published on:
13 Jan 2026 10:20 pm
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