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132 वर्ष पहले जहाज ने ली थी जल समाधि, 1300 लोगों की हुई थी मौत

आज के दिन ‘वैतरणा’ की पहली यात्रा बन गई थी अंतिम यात्रा इसे गुजरात के टाइटेनिक की दी जाती है संज्ञा

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132 वर्ष पहले जहाज ने ली थी जल समाधि, 1300 लोगों की हुई थी मौत

132 वर्ष पहले जहाज ने ली थी जल समाधि, 1300 लोगों की हुई थी मौत

प्रभास पाटण. गुजरात के सोरठ क्षेत्र में एक करुण घटना को आज 132 वर्ष पूरे हो रहे हैं। 8 नवंबर 1888 को वैतरणा नामक जहाज ने समुद्र में जल समाधि ली थी। इसके साथ ही इस जहाज की पहली ही यात्रा अंतिम यात्रा बन गई थी। इस घटना में 1300 लोगों की मौत हो गई थी।
दीपावली के पांच दिन बाद लाभ पांचम के दिन कच्छ जिले के मांडवी से वैतरणा जहाज की पहली यात्रा का मुहूर्त था। शेफर्ड एंड कंपनी के इस जहाज की लंबाई 171 फीट, चौड़ाई 26.5 फीट ऊंचाई 9.9 फीट थी। 13 नॉटिकल मील प्रति घंटा गति वाले और 1047 यात्रियों की क्षमता वाले इस तिमंजिले जहाज के निर्माण में तीन वर्ष का समय लगा था।
जहाज को देखने के लिए पूरे मांडवी नगर के लोग बंदरगाह पर पहुंचे थे। जहाज में विवाह के गीतों के गायन के साथ बारातियों व बोर्ड परीक्षा देने के लिए जाने वाले विद्यार्थियों सहित 1300 लोग सवार हुए। जहाज के कैप्टन हाजी कासम ने जैसे ही प्रथम यात्रा पर रवाना होने के लिए व्हीसल बजाई, पूरा बंदरगाह परिसर हर्ष नाद से गूंज उठा।
मांडवी से सवेरे साढ़े सात बजे यह जहाज मुंबई के लिए रवाना हुआ। यह जहाज दोपहर 12 बजे द्वारका और शाम 5.30 बजे पोरबंदर पहुंचा। उस समय ब्रिटिश सरकार के प्रशासक की ओर से चेतावनी दी गई कि आगे तूफान है, इसलिए जहाज को आगे बढऩे की मंजूरी नहीं दी गई। इसके लिए सिग्नल भी लगाया गया था।
इसके बावजूद जहाज को आगे बढ़ाया गया। 8 नवंबर की मध्यरात्रि बाद करीब एक बजे यह जहाज जूनागढ़ जिले में मांगरोल के समीप समुद्र में ऊंची उठती लहरों की चपेट में आ गया। इसके साथ ही सोमनाथ व पोरबंदर के बीच जहाज ने 1300 लोगों के साथ जल समाधि ले ली। इस जहाज की प्रथम यात्रा ही अंतिम यात्रा बन गई और सभी 1300 लोगों की मौत हो गई।

लोकगीत, फिल्में और नाटक भी बने

इस घटना को लेकर कई कहानियां, लोकगीत लिखी गई वहीं फिल्में और नाटक भी बने। लेखक दिवंगत गुणवंतराय आचार्य ने इस घटना को लेकर उस समय ‘हाजी कासम तारी विजली’ नामक पुस्तक लिखी। राष्ट्रीय शायर झवेरचंद मेघाणी ने लोकगीत संग्रह ‘रढियाली रात’ में ‘हाजी कासम तारी विजली रे मध दरिये वेरण थई’ का करुण गीत लिखा। यह गीत वर्तमान समय में भी गांवों की गलियों में गाया जाता है।