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जामनगर में ऐसी गरबी, जहां सिर्फ पुरुष ही खेलते हैं गरबा

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जामनगर में ऐसी गरबी, जहां सिर्फ पुरुष ही खेलते हैं गरबा

जामनगर में ऐसी गरबी, जहां सिर्फ पुरुष ही खेलते हैं गरबा

जामनगर. नवरात्र शुरू होने के साथ ही गुजरात गरबा के रंग में रंग जाता है। सोसायटियों से लेकर पार्टी प्लॉटों में बच्चे, युवक-युवतियां एवं बुजुर्ग सभी साथ मिलकर गरबा खेलते हैं और मां आद्यशक्ति की आराधना करते हैं। ऐसे में कुछ स्थलों पर अभी प्राचीन परम्परा के अनुसार गरबे खेलकर माता की आराधना करते हैं। ऐसे की गरबों में शामिल हैं जामनगर की जूनी जलानी जार चौक के गरबे, जहां आज भी सिर्फ पुरुष ही गरबा खेलते हैं। यहां गरबे में महिलाएं शामिल नहीं होती है।

ईश्वर विवाह पर लगातार ३.३० घंटे खेलते हैं गरबा

वडोदरा की तरह में ही जामनगर की जलानी जार के चौक में करीब सवा तीन सौ वर्षों से पुरुषों की गरबी होती है, जहां नवरात्र के दौरान सातम को ईश्वर विवाह उत्सव मनाया जाता है, जिसमें लगातार साढ़े तीन घंटे तक गरबा गाते हैं और खेलते हैं। कवि देवीदास रचित ईश्वर विवाह गाते-गाते गरबा खेलते हैं। बताया जाता है कि इस दिन यहां रहनेवाले लोग दूर-दूर से गरबे में एकत्रित हो जाते हैं।


ढोल व नौबत वाद्ययंत्रों से होने वाली इस गरबी में पुरुष परम्परागत धोती-कुर्ता व मुकुट पहनकर और माथे पर चंदन लगाकर भाग लेते हैं। दशहरा की रात माताजी को कनकाई के छंदों के साथ विदाई दी जाती है। इस गरबी में भाग लेने के लिए सिर्फ कपड़ों का ही नियम है, बाकी किसी भी जाति के भक्त भाग ले सकते हैं।

३० किलो चांदी से मढ़ा माता जी का मढ़

विश्वनाथ गुरु के प्रपौत्र जयदेव गुरु के प्रयासों से माताजी का मढ़ ३० किलो चांदी से मढ़ा गया है। गरबी में चांदी जडि़त मढ़ व चांदी जडि़त मां नवदुर्गा की प्रतिमा सदियों पुरानी हैं।

ऐसे शुरू हुई यह गरबी

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस क्षेत्र में बाजरीयाफली नामक शेरी में चत्रभुज त्रिवेदी रहते थे। वह देर रात को लघुशंका के लिए गए तो उन्हें जलानी जार चौक में नौबत (नगाड़े) की आवाज सुनाई दी। वहां देखा तो नौ बालिकाएं गरबा खेलती दिखाई दी। यह सब देखकर वह घर पहुंचे और सो गए। बाद में माताजी सपने में आई और इस चौक में नवरात्र में स्थापना करके गरबा खेलने की प्रेरणा दी थी। ऐसे में दूसरी वर्ष चौक में स्थानीय पुरुषों को साथ रखकर गरबी शुरू की। उस समय लाउड स्पीकर नहीं थे। ऐसे में पुरुष ही गरबा गाकर माता की आराधना करते थे। तभी से यह परम्परा चली आ रही है, जो ३२९ वर्ष बाद भी जारी है।