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शिक्षा, सादगी व सेवा का संगम, ‘पंडित’ रामस्वरूप का जीवन

आर्य समाज के विचारों से प्रेरित, समाजसेवा को बनाया जीवन का ध्येय, ‘रसोई में दवाई’ पुस्तक में बताए अनाज, फल, फूल, दाल, मसाले और सब्जियों के माध्यम से बीमारियों से बचाव के उपाय

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अजमेर

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दिनेश कुमार शर्मा

Mar 20, 2026

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पंडित रामस्वरूप, समाजसेवी

दिनेश कुमार शर्मा

अजमेर (Ajme news). ज्ञान, सादगी और सेवा इन तीन मूल्यों को जीवन का आधार बनाने वाले इस प्रेरक व्यक्तित्व ने समाज के लिए मिसाल कायम की है। मूलवेद, ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक, उपनिषद, वेदांग, उपवेद और षटदर्शन का गहन अध्ययन करने के कारण उन्हें ‘पंडित’ कहा जाने लगा, जबकि वे मेढ़ क्षत्रिय स्वर्णकार समाज से ताल्लुक रखते हैं।

स्कूलों में शिक्षण कार्य

हाथी भाटा राजेन्द्रपुरा निवासी 83 वर्षीय पंडित रामस्वरूप की पारिवारिक पृष्ठभूमि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी रही। उनके दादाजी पन्नालाल भिनाय के सरपंच रहे। प्रारंभिक शिक्षा टीकमचंद जैन स्कूल में हुई। इसके बाद 1962 में राजकीय महाविद्यालय से 11वीं, 12वीं और बीएससी की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 1963 से 1966 तक उन्होंने विभिन्न स्कूलों में शिक्षण कार्य भी किया।

‘रसोई में दवाई’

शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में उनकी सक्रियता लगातार बनी रही। बीएड और एमएड कॉलेजों में उन्होंने सैकड़ों व्याख्यान दिए। उन्होंने ‘रसोई में दवाई’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें अनाज, फल, फूल, दाल, मसाले और सब्जियों के माध्यम से बीमारियों से बचाव के उपाय बताए गए हैं। इसके अलावा उन्होंने 5000 से अधिक हस्तलिखित पृष्ठों का संकलन किया, जिनमें विश्व शांति और भारत-पाक जनकष्ट निवारण जैसे विषय प्रमुख हैं। उनके विभिन्न विषयों पर लगभग 200 से 250 निबंध प्रकाशित हो चुके हैं।

गो-संरक्षण के लिए प्रयास

बचपन में ही स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने खादी पहनना शुरू किया और आज भी धोती, कुर्ता, बंडी, कोट और पगड़ी में ही नजर आते हैं। वे पूरी तरह दुग्ध-शाकाहारी हैं और गो-संरक्षण के लिए प्रयासों से जुड़े हुए हैं। आर्य समाज से उनका जुड़ाव बचपन से रहा है और महर्षि दयानंद सरस्वती के विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए उन्हें राज्य व राष्ट्रीय स्तर के संगठनों में विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है।

डकैतों के आत्मसमर्पण और सुधार के प्रयास

वे महर्षि दयानंद निर्वाण न्यास के संस्थापक सदस्यों में भी शामिल हैं तथा गोकृषि आदि रक्षणि सभा से जुड़े हैं। वर्ष 1977 से 1980 तक वे गांधी शांति प्रतिष्ठान, दिल्ली के केंद्रीय समन्वयक रहे हैं और प्रख्यात गांधीवादी डॉ. एस. एन. सुब्बाराव के साथ काम किया। चंबल घाटी में डकैतों के आत्मसमर्पण और सुधार के प्रयासों में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

व्यक्तित्व राष्ट्रसेवा में समर्पित

परिवार में दोनों छोटे भाई किशन व विक्रम वर्मा जहां कृषि कार्य में सिंचाई के उपकरण समेत अन्य पुस्तैनी व्यापार कर रहे हैं, वहीं महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाषचंद्र बोस से प्रेरित पंडित रामस्वरूप का व्यक्तित्व राष्ट्रसेवा में समर्पित रहा। उनका कहना है ‘जीवन में कल कुछ नहीं होता, इसलिए हर काम आज ही पूरी निष्ठा से करें।’ आज भी वे प्रतिदिन 2 से 3 किलोमीटर पैदल चलते हैं।

सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की परेशानियों को जानें

उनका मानना है कि देश के सीमावर्ती इलाकों के लोग आज भी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। वे चाहते हैं कि एक समिति बने जो सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों की परेशानियों को जाने और रिपोर्ट बनाकर सरकार को दे, जिससे उनकी समस्याओं के निराकरण के लिए कार्य किया जा सके।