ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की महाना छठी पर शनिवार को जायरीन की भीड़ उमड़ी। गर्मी की छुट्टियां होने से जायरीन की आवाजाही से दरगाह में रौनक नजर आई। फातिहाख्वानी के बाद मुल्क में अमन व भाईचारे की मजबूती के लिए दुआ की गई। दरगाह के अहाता ए नूर में सुबह 9 बजे कुरान शरीफ की तिलावत से छठी का आगाज हुआ। खुद्दाम ए ख्वाजा की ओर से यह रस्म अदा कराई गई।
एक भी दिन नहीं टूटी शादियाने बजाने की परम्परा
अजमेर. ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह में शादियाने बजाने की सदियों पुरानी परम्परा बदस्तूर जारी है। उर्स के अलावा रोजाना सुबह-शाम की नमाज तथा रोशनी के वक्त शादियाने गूंजते हैं। इसकी एवज में नक्कारची महज 6 रुपए सालाना पारिश्रमिक लेते हैं। उनके लिए गरीब नवाज की नियमित सेवा वेतन से कहीं ज्यादा कीमती है। मुगल बादशाह अकबर ने 15वीं शताब्दी में दरगाह में शादियाने बजाने की जिम्मेदारी इमामबक्श और अल्लाहबक्श नक्कारची को दी थी। उनकी नवीं पीढ़ी के शमीम अहमद और उनका परिवार शादियाने बजाने की परम्परा को आज भी निभा रहा है।रोजाना बजाते शादियाने
शमीम अहमद ने बताया कि शाहजहांनी गेट स्थित नौबत खाना में वे रोजाना फजर और मगरिब की नमाज और रोशनी के दौरान शादियाने बजाते हैं। इसके अलावा गरीब नवाज के सालाना उर्स, ईद, रमजान और अन्य अवसरों पर शादियाने बजाए जाते हैं।6 रुपए भी बरकत के…
शमीम ने बताया कि 15 वीं शताब्दी में बादशाह अकबर ने 50 पैसे के हिसाब से साल के 6 रुपए वेतन तय किया। तबसे परिवार सिर्फ 6 रुपए ही वेतन ले रहा है। परिवार का मानना है कि गरीब नवाज की सेवा के आगे 6 रुपए कुछ नहीं हैं। उनकी दुआओं और सेवा से परिवार अपना गुजारा कर लेता है।
दो बड़े, छह छोटे शादियाने
अकबर ने दरगाह में दो बड़े शादियाने दिए थे। बाद में उसके पोते शाहजहां ने छह छोटे शादियाने दिए। रोजाना रोशनी के वक्त 51 से 55 डंकों की थाप से बड़े शादियाने बजाए जाते हैं। ख्वाजा साहब के सालाना उर्स का चांद दिखने और छठी शरीफ की रस्म पर शादियाने बजाने की विशेष परम्परा है।
विशिष्ट अतिथियों के लिए भी वादन
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और विदेशी मुल्कों के पीएम-राष्ट्रपतियों के आगमन पर भी शादियाने बजाने की परम्परा है। शमीम अहमद के अलावा दिलनवाज, इम्तियाज अहमद, माजिद और जावेद अहमद भी सहयोग करते हैं।
कभी नहीं रुका सिलसिला
शमीम ने बताया कि परिवार में शादी, गमी या कोई कार्यक्रम हो, लेकिन नौबत खाने में शादियाने बजाने की परम्परा सदियों से नहीं टूटी है। पीढ़ी दर पीढ़ी बड़े-बुजुर्ग, बच्चे इसे निभा रहे हैं।