
sindhi culutre in ajmer
सुरेश लालवानी/अजमेर
सिंधी समाज के संत कंवरराम का बरसी महोत्सव पूरे देश में मनाई जाती है। समाज के वे पहले संत थे जिनकी धार्मिक गतिविधियों की वजह से हत्या कर दी गई। सिंधी समाज में उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया है। देश और विदेश में जहां भी सिंधी रहते है वहां ईष्टदेव झूलेलाल के अलावा संत कंवरराम की जयंती और बरसी प्रति वर्ष मनाई जाती है।
कहीं बड़े स्तर पर तो कहीं बस औपचारिकता की तरह। जैसा कि पहले भी जिक्र कर चुका हूं कि अजमेर एक तरह से सिंधियों की राजधानी है। ऐसे में सिंधी समाज का कोई भी त्यौहार हो वह बड़ी शानो शौकत से मनाया जाता है।
संत कंवरराम की बात हो रही है तो सिंधी समाज के लोक संगीत ‘भगत’ का जिक्र जरुरी है। पैरों में घुंघरु, चोगानुमा कुर्ता, सिर पर पगड़ी पहनकर देवी देवताओं और कुल गुरुओं की जीविनी का जिक्र गीतों के माध्यम से किया जाता था। अमूमन अधिकांश भजन मंडलियां अपने लोक संगीत को इसी तरह पेश करते हैं। सिंधी समाज में भी लगभग 20-25 वर्ष पहले तक अनेक भगत मंडलियां काफी लोकप्रिय थी। यही वह समय था जब संत कंवरराम की बरसी एक बड़े उत्सव के रूप में मनाई जाती थी। मोइनिया इस्लामिया स्कूल का बड़ा खेल मैदान पूरी रात रोशन रहता था।
सिंधी समाज के हजारों युवा, बुजुर्ग और महिलाएं पूरी रात चलने वाली भगत को सुनने वहां पहुंचते थे। लाउड स्पीकर पर सिंधी गीत और भजन पूरी रात गूंजते रहते थे। अब तो खैर जागरण, भगत हो या फिर कै सा भी धार्मिक आयोजन। रात दस बजे बाद ध्वनि विस्तारक यंत्रों मेरे कहने का मतलब डी जे और लाउडस्पीकर पर कानूनन रोक के कारण पूरी रात संभव ही नहीं है।
लोगों की मानसिकता और युवा पीढ़ी की अलग लाइफ स्टाइल के चलते भी भगत और धार्मिक आयोजनों के प्रति वो जुनुन नजर नहीं आता । टीवी ने तो खैर इन लोक गीत और संगीत का जायका ही बिगाड़ कर रख दिया है।
खैर जमाना कितना भी बदल जाए लेकिन यह तय है कि कोई भी समाज अपने धार्मिक गुरुओं, ईष्टदेव अथवा धार्मिक गतिविधियों को नहीं भुला पाता। पीढ़ी दर पीढ़ी मिलने वाले संस्कारों की बदौलत प्रत्येक पीढ़ी में कुछ लोग सामने आ ही जाते हैं जो अपनी परम्पराओं और संस्कारों का झंडा बुलंद करते चलते है और जाते जाते मशाल नई पीढ़ी के ही ऐसे कुछ संस्कारवान लोगों के हाथों मे दे जाते हैं। अजमेर में भी संत कंवरराम मंडल द्वारा आजादी के बाद से ही संत कंवरराम की बरसी और जयंती लगातार मनाई जाती रही है।
संत कंवरराम के बारे में ऐसी मान्यता प्रचलित है कि उन्होंने अपने इसी तरह के भगत कार्यक्रम में एक मृत बच्चे को लोरी सुनाकर जीवित कर दिया था। इसके बाद से ही भगत में कलाकार अपनी गोद में छोटे बच्चों को उठाकर लोरी गाकर उनके दीर्घायु की कामना करते हैं। हालांकि सिंधियों का यह परम्परागत धार्मिक कार्यक्रम भगत अब लुप्त होने की कगार पर है। न तो उसे पुराने अंदाज में पेश करने वाले कलाकार है और न ही उसे सुनने वाले पुराने लोग बचे हैं। नई पीढ़ी को इस तरह के कार्यक्रम रास भी कहां आते हैं।
सिंधियों की नई पीढ़ी लोक संगीत भगत से अनजान है। पुराने समय में कोई भी धार्मिक आयोजन बिना भगत के पूरा नहीं हो पाता था। रात आठ बजे से सुबह छह बजे तक एक ही भगत मंडली कार्यक्रम प्रस्तुत करती थी। ईष्टदेवों सहित रामायण और महाभारत के अनेक प्रसंग इसी भगत के माध्यम से सुनाए जाते थे।
-दिलीप बूलचंदानी
सिंधी समाज ने सिंध में अपनी संस्कृति और संस्कारों को कायम रखने के लिए काफी मेहनत की। ईष्टदेव झूलेलाल ने अवतार लेकर सिंधी समाज की रक्षा की थी। संत कंवरराम ने भी लोक संगीत के माध्यम से धर्म की अलख जगाए रखी। कट्टरपंथियों को यह नागवार गुजरा और उनकी हत्या कर दी। लेकिन वे आज भी समाज में याद किए जाते हैं और उनकी जयंंती और बरसी महोत्सव पूरे देश में धूम धाम से मनाया जाता है
-लता जेठरा
सिंधुपति दाहरेसन, शहीद हेमू कालाणी और संत कंवरराम सिंधी समाज के आदर्श हैं। नई पीढ़ी के अनेक लोगों ने उनके पदचिह्नों पर चलकर समाज और धर्म की रक्षा का बीड़ा उठाया है। महापुरुषों की जयंती और बरसी कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को उनके जीवन चरित्र और त्याग की जानकारी मिलती है। यही आयोजन ऐसे हैं जिनकी बदौलत समाज के संस्कार और संस्कृति नई पीढ़ी तक पहुंचती है।
-जानकी मोटवानी
Published on:
10 Nov 2018 09:26 am
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