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कागजों में कैद अवंती बाई लोधी रिसर्च चेयर, यह है इसकी सबसे बड़ी वजह

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avanti bai lodhi chair

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अजमेर.

महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय में ‘ रानी अवंती बाई लोधी’ शोध पीठ स्थापना का प्रस्ताव कागजों में दफन हो गया है। शिक्षकों और संसाधनों की कमी के चलते यहां पीठ खुलना मुश्किल है। कुलपति पद पर मंडराए संकट से भी विश्वविद्यालय कोई फैसला लेने में सक्षम नहीं है।

विश्वविद्यालय में मौजूदा वक्त अम्बेडकर पीठ, सिंधु पीठ, पृथ्वीराज चौहान शोध पीठ स्थापित हैं। इन्हें यूजीसी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्वविद्यालय ने बजट मुहैया कराया है। इन विशेष पीठ में शोध, पाठ्यक्रमों की शुरुआत और शैक्षिक कार्यक्रम कराए जा रहे हैं। इसके अलावा महर्षि दयानंद शोध पीठ पिछले साल मिली है। पिछली भाजपा सरकार और राजभवन ने साल 2017 में रानी अवंती बाई लोधी शोध पीठ स्थापित करने का प्रस्ताव था। लेकिन यह अस्तित्व में नहीं आ पाई है।

शिक्षक-संसाधनों की कमी

रानी अवंती बाई लोधी शोध पीठ की स्थापना में संसाधन और शिक्षकों की कमी सबसे बड़ा कारण है। विश्वविद्यालय में मौजूदा समय महज 18 शिक्षक हैं। खासतौर यहां इतिहास विभाग में कोई स्थाई शिक्षक नहीं है। दूसरे विभागों के शिक्षकों पर पहले ही कार्यभार ज्यादा है। ऐसी स्थिति में गेस्ट फेकल्टी के भरोसे शोध पीठ का संचालन करना मुश्किल है। इसके अलावा शोध पीठ की उपयोगिता और अन्य बिन्दुओं पर भी विश्वविद्यालय को विचार करना होगा। मालूम हो कि तत्कालीन भाजपा सरकार और राजभवन ने इस शोध पीठ की स्थापना पर खास जोर दिया था।

यह थीं रानी अवंती बाई........
रानी अवंती बाई लोधी (1817 से 1858 ई.) का ताल्लुक मध्यप्रदेश के रामगढ़ रियासत से था। वे मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह की पुत्री थीं। इनका विवाह रामगढ़ के राजकुमार विक्रमादित्य सिंह के साथ हुआ था। 1857 की क्रांति में रानी अवंतीबाई की विशेष भूमिका रही। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेजों ने उनके पति विक्रमादित्य सिंह को विक्षिप्त और पुत्रों को नाबालिग करार देकर कोर्ट ऑफ अवार्ड के तहत रियासत को हड़पने का प्रयास किया। अवंती बाई और अंग्रेजों के बीच कई बार युद्ध हुआ। 1858 में देवहारगढ़ युद्ध के दौरान बुरी तरह घायल होने के बाद अवंती बाई ने छुरा घोंपकर खुद का बलिदान कर दिया था।