अजमेर. ईद के मौके पर ख्वाजा साहब की दरगाह स्थित जन्नती दरवाजा भी खोला गया। बुधवार तडक़े 4 बजे से लेकर दोपहर 2 बजे तक इस दरवाजे से गुजर कर जियारत करने वालों की होड़ मची रही। यह दरवाजा साल में चार बार विशेष मौकों पर ही खोला जाता है। यही कारण है कि दरवाजा खुलने से पहले ही महिला-पुरुष जायरीन की लम्बी कतार लग गई। जैसे ही दरवाजा खोला गया, लोगों में यहां से गुजरने की होड़ मच गई। धार्मिक मान्यता है कि कोई बीमार, आर्थिक कारण या शारीरिक अक्षमताओं के चलते हज पर नहीं जा पाता, वह दरगाह स्थित जन्नती दरवाजे से आस्ताना में प्रवेश कर मजार पर मत्था टेकता है। ऐसा भी कहा जाता है कि जो सात बार इस दरवाजे से गुजर कर जियारत करता हैं वह जन्नत का हकदार होता है। इसी ख्वाहिश के चलते अकीदतमंद में जन्नती दरवाजे से गुजरने की होड़ मची रहती है।
पांच दिन बाद फिर खुलेगा जन्नती दरवाजा
जन्नती दरवाजा साल में चार बार विशेष मौकों पर खोला जाता है। ईदुल फितर के अलावा यह दरवाजा बकराईद, ख्वाजा साहब के उर्स और ख्वाजा साहब के गुरु ख्वाजा उस्मान हारूनी के उर्स में भी जन्नती दरवाजा खोला जाता है। ख्वाजा साहब के उर्स में यह दरवाजा छह दिन तक खुला रहता है। उर्स के दौरान चांद रात को ही यह दरवाजा खोल दिया जाता है जो रजब की छह तारीख तक खुला रहता है। गौरतलब है कि पांच दिन बाद ख्वाजा साहब के गुरु ख्वाजा उस्मान हारूनी का उर्स है। हारूनी के उर्स में भी यह दरवाजा खोला जाएगा।
इसलिए है यह मान्यता
जन्नती दरवाजे का निर्माण ख्वाजा हुसैन नागौरी ने करवाया था। मुगल बादशाह शहंशाह ने सन् 1643 में इसे मुकम्मल कराया। यह भी कहा जाता है कि ख्वाजा साहब स्वयं इस रास्ते से ही अपने हुजरे में आते-जाते थे। दरगाह दीवान जैनुअल आबेदीन ने बताया कि जन्नती दरवाजे का रुख पश्चिमी दिशा में होने से इसे विशेष धार्मिक महत्व मिला। धार्मिक स्थल मक्का के इसी दिशा में होने से जन्नती दरवाजा को मक्की दरवाजा भी कहा जाता है। इन्हीं मान्यताओं के चलते दरवाजे से निकलना जन्नत नसीब होने के बराबर माना जाता है।