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भीकाजी की बावड़ी : कभी बुझाती थी प्यास, आज तरस रही बूंद-बूंद पानी को

पुरामहत्व के जल स्रोत संरक्षण की दरकार

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Bhikaji ki bawdi - Historical water source

भीकाजी की बावड़ी : कभी बुझाती थी प्यास, आज तरस रही बूंद-बूंद पानी को

बलजीत सिंह. अजमेर. किसी समय अजमेर शहर और जिला जल संरक्षण के दृष्टिकोण से समृद्ध था। झील, कुएं, तालाब और बावडिय़ां वर्षा जल से लबालब रहा करती थी। सूखा, अकाल और अल्पवृष्टि की स्थिति में यही जलाशय पेयजल का प्रमुख स्रोत हुआ करते थे। लेकिन हरियाली का विनाश और अंधाधुंध जल दोहन से भू-जल स्तर में इस कदर कमी आई कि परंपरागत जल स्रोत सूखने लगे। पानी माफिया ने धरती का जल भी सोख लिया। कृषि वर्षा आधारित बारानी हो गई। ऐसी स्थिति में बीसलपुर बांध परियोजना जिले के लिए जीवनदायिनी साबित हुई लेकिन इसी कारण ही परंपरागत जल स्रोतों की बेकद्री भी शुरू हो गई।

हमारे पूर्वज जल का महत्व जानते थे यही कारण है कि उन्होंने बूंद-बूंद पानी को सहेजने पर जोर दिया। जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके किए कार्य आज भी ऐतिहासिक कुओं और बावडिय़ों के रूप में मौजूद हैं। ऐसी ही एक ऐतिहासिक बावड़ी है भीकाजी की बावड़ी।

अजमेर से 18 किमी पूर्वोत्तर दिशा में गगवाना के नजदीक अजमेर-जयपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित भीकाजी की बावड़ी स्थापत्य कला का एक नायाब नमूना है। ये अलग बात है कि इस बावड़ी में अब नाममात्र को भी पानी नहीं है लेकिन यह उस समय के जल संरक्षण के क्षेत्र में किए गए उत्कृष्ट कार्य का अद्भुत नमूना है। पुरातात्विक महत्त्व की इस बावड़ी में पानी तक पहुंचने के लिए सीढिय़ां बनी हुई हैं।

भीकाजी की बावड़ी मुगलकालीन है। बावड़ी पर बने संगमरमर के शिलापट्ट पर इसके निर्माण का समय हिजरी संवत 1024 (1615 ईस्वी) अंकित है। यह लेख फारसी भाषा में है। अभिलेख फलक पर उकड़ू बैठा हुआ हाथी, अंकुश एवं त्रिशूल बना है। इस बावड़ी के पानी से दिल्ली-आगरा और जयपुर की तरफ से आने वाले राहगीर अपनी प्यास बुझाया करते थे। लेकिन समय के साथ कम वर्षा और भू-जल स्तर गिरने से ये बावड़ी पूरी तरह सूख चुकी है। कई बार श्रमदान कर इसे गहरा करवाया गया लेकिन पानी नहीं आया। जल संकट के इस दौर में यदि थोड़ा प्रयास किया जाए तो पुरामहत्व के जलस्रोत भीकाजी की बावड़ी के स्वर्णिम दिन लौट सकते हैं।