अजमेर. भारतीय जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ तीर्थ दादाबाड़ी में बुधवार से शुरू होने वाले दो दिवसीय दादा मेले में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ेगा।मंगलवार से ही यहां दूर राज्यों के श्रावक-श्राविका पहुंच गए। यह मेला पिछले 50 सालों से लग रहा है। वर्ष 1958 से जैन कोकिला विचक्षण श्रीजी की प्रेरणा से दादागुरूदेव की स्वर्गारोहण तिथि पर दो दिवसीय दादा मेले की परम्परा शुरू की गई। मेले में मंदिर के भव्य आंगी रचना की जाती है। बड़ी पूजा, भक्ति संध्या व रात्रि जागरण के विशेष आयोजनों में देशभर से भक्त कलाकार जुड़ते हैं। अन्य धर्मों के लोग भी मेले में आते हैं।
जिनदत्तसूरि मंडल करता है इंतजामयात्रियों की सुविधाओं के मद्देनजर 1952 में जिनदत्तसूरि मंडल संस्था श्रद्धालुओं के आवास, खानपान की जिम्मेदारी निभाती है। धार्मिक, समाजोपयोगी आयोजन किए जाते हैं। यात्री निवास, वाचनालय व पुस्तकालय हैं। जिसमें प्राचीन जैन साहित्य उपलब्ध है। योग्य छात्रों को छात्रवृति दी जाती है।
स्थापना के साथ जैन धर्म का प्रचार-प्रसारशहर की स्थापना के साथ जैन धर्म का प्रचार-प्रसार शुरू हो गया था। देश के प्रथम दादा गुरूदेव जिनदत्तसूरिश्वर देशभर में भ्रमण करने के बाद यहां पहुंचे। राजा अरणोराज को प्रतिबोधित कर 79 वर्ष की आयु में विक्रम संवत 1211 को आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देह त्याग स्वर्ग सिधार गए। उनके बाद देशभर में जिनचंद्रसूरि महाराज ही जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ आमनाय के लम्बे इतिहास में दादागुरू हुए हैं। इसी लिहाज से जिनदत्तसूरि का समाधि स्थल दादाबाड़ी अखिल भारतीय स्तर पर सर्वोच्च स्थान रखता है। इसी स्थल पर जैनशासन के प्रथम दादागुरू की पार्थिव देह को अग्नि के समर्पित किया गया था।
एक लाख तीस हजार लोगों को दी दीक्षादादागुरू ने एक लाख तीस हजार लोगों को जैन धर्म की दीक्षा देकर ओसवाल जाति में शामिल कर गोत्र दिए। 52 वीर, 64 योगिनियां व 5 पीर सदा उनकी सेवा में रहते थे।
उन्होने अपने पट्ट शिष्य श्रीमणिधारी जिनदत्तसूरि को अजमेर में दीक्षा दी थी। मणिधारी ने गुरू की समाधि पर संगमरमर के स्तूप की प्रतिष्ठा कराई। तभी से यह स्थान जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छाचार्य जिनदत्तसूरि दादाबाड़ी अजमेर के नाम से विख्यात है।