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फैशनेबल कपड़ों को कहना पड़ेगा बाय-बाय, स्टूडेंट्स को पहननी पड़ेगी खास कलर की ड्रेस

कमेटी की सिफारिश पर छात्र-छात्राओं के लिए ड्रेस कोड लागू होगा।

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dress code for college students

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सरकार की कॉलेज में ड्रेस कोड लागू करने की मंशा के अनुरूप कॉलेज में तैयारियां शुरू हो गई हैं। विभिन्न कॉलेज ड्रेस कोड तय करने के लिए कमेटी का गठन करेंगे। कमेटी की सिफारिश पर छात्र-छात्राओं के लिए ड्रेस कोड लागू होगा।

कॉलेज शिक्षा निदेशालय ने सत्र 2018-19 में सभी कॉलेज में ड्रेस कोड लागू करने को कहा है। इसके तहत छात्र-छात्राओं को निर्धारित रंग की ड्रेस पहननी होगी। अजमेर में सम्राट पृथ्वीराज चौहान राजकीय महाविद्यालय, राजकीय कन्या महाविद्यालय और अन्य कॉलेज में ड्रेसकोड लागू होगा।

इसके लिए प्राचार्य कमेटियों का गठन करेंगे। कमेटियों में महिला और पुरुष व्याख्याता शामिल होंगे। यह ड्रेस का रंग निर्धारित कर प्राचार्यों को रिपोर्ट देंगे।

सावित्री कॉलेज में लागू हुई थी ड्रेस90 के दशक में शहर के नामचीन सावित्री कॉलेज में ड्रेस कोड लागू किया गया था। छात्राओं के लिए गुलाबी सलवार-सूट, चुन्नी और सर्दियों में काला स्वेटर निर्धारित किया गया। ड्रेस कोड की आलोचना होने और छात्राओं के खिलाफ अनर्गल टिप्पणियों के बाद कॉलेज ने इसे एक साल बाद ही समाप्त कर दिया था।

कई कॉलेज में लागू

राज्य के राजकीय महाविद्यालय शाहपुरा और उदयपुर के मीरा कन्या महाविद्यालय में कई बरसों से ड्रेस कोड लागू है। यहां छात्र-छात्राओं को निर्धारित ड्रेस पहननी पड़ती है। इनके अलावा अजमेर में भी सरकारी और निजी बॉयज और गल्र्स इंजीनियरिंग कॉलेज, विभिन्न प्रबंधन संस्थानों में ड्रेस कोड लागू है।

लॉ कॉलेज में भी ड्रेस
प्रदेश के सभी 15 लॉ कॉलेज में मूट कोर्ट प्रेक्टिस होती है। इसके लिए स्टूडेंट्स को सफेद शर्ट-पैंट या सलवार सूट पहनना पड़ता है। इन मूट कोट्र्स में बाकायदा सेशन कोर्ट, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर मुकदमों पर बहस होती है। स्टूडेंट्स की प्रेक्टिस के लिए जज, वकील और आरोपित भी बनाए जाते हैं। स्टूडेंट्स को परीक्षा में मूट कोर्ट में भाग लेने के नम्बर भी दिए जाते हैं।

ब्रिटिशकाल में टीचर्स के लिए रॉब
ब्रिटिशकाल में कॉलेज और यूनिवर्सिटी टीचर्स और न्यायालय में जज एवं वकीलों को ब्लैक रॉब (गाउन) पहनना पड़ता था। ब्लैक रॉब पहने बिना टीचर्स क्लास में पढ़ा नहीं सकते थे। साथ ही अदालतों में वकीलों की एन्ट्री नहीं होती थी। आजादी के बाद रॉब को ब्रिटिश मानसिकता का परिचायक मानते हुए इसे हटा दिया गया।