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शहर में मिल रहा रोजगार, रैन बसेरों में कट रही हैं सर्द रात

प्रदेश के कई शहरों के मेहनतकश लोगों के लिए बन रहे आश्रय स्थल, परिवार से दूर रहकर दो वक्त की रोटी के लिए कर रहे दैनिक मजदूरी जीवन की मूल आवश्यकता रोटी, रोजगार और सिर पर छत। इसकी तलाश में सैकड़ों लोग शहर में आए और यहीं के होकर रह गए। ये अब यहीं रहकर परिवार के लालन-पालन के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं।

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अजमेर

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Dilip Sharma

Dec 07, 2023

दिलीप शर्मा

जीवन की मूल आवश्यकता रोटी, रोजगार और सिर पर छत। इसकी तलाश में सैकड़ों लोग शहर में आए और यहीं के होकर रह गए। ये अब यहीं रहकर परिवार के लालन-पालन के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं। इनके इस संघर्ष के साक्षी बन रहे हैं शहर के रैन बसेरे। इनमें इन्हें सर्द रात में राहत नसीब हो रही है।शहर में पड़ रही तेज सर्दी के बीच रैन बसेरों में प्रदेश के कई शहरों के मेहनतकश लोगों को छत नसीब हो रही है। ये लोग परिवार से दूर दिनभर शहर में मेहनत-मजदूरी कर परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं तो रात को रैन बसेरे इनके आश्रय स्थल बन रहे हैं। इनमें से अधिकांश का कहना है कि शहर में मजदूरी मिल रही है तो परिवार से दूर यहीं ठहर गए। दिन में दैनिक रोजगार मिल जाता है। सरकारी स्तर पर बनी रसोइयों में सस्ती दर पर भोजन का इंतजाम हो जाता है, वहीं रैन बसेरों में सिर पर छत और बिस्तर उपलब्ध हो जाते हैं। राजस्थान पत्रिका टीम ने देर रात्रि रैन बसेरों और वहां रह रहे लोगों के हालात जाने तो कुछ ने ऐसे ही अनुभव साझा किए।

बिस्तरों की व्यवस्था, अलाव के लिए ईंधनपड़ाव, आजाद पार्क के सामने व देहली गेट लाल मंदिर के सामने बने रैन बसेरों का स्वरूप बदला नजर आया। इन रैन बसरों में पर्याप्त साफ सफाई नजर आई। शौचालय व सरक्यूलेटिंग एरिया भी साफ नजर आए। लोहे के फ्रेम वाले दो मंजिला डबल बेड बनाए गए हैं। इनमें बिस्तर रजाई की पर्याप्त व्यवस्था है। सर्दी में अलाव के लिए ईंधन भी है। प्रभारी फकरुद्दीन, हर्षवर्धन सिंह, विष्णु जांगिड़ मौके पर मौजूद मिले। रजिस्टर में एंट्री के अनुसार आजाद पार्क वाले रैन बसेरे में 39, पड़ाव में 29 तथा देहली गेट वाले रैन बसेरे में 34 जने आश्रय स्थल पर आराम कर रहे थे।

लोगों की कहानी उनकी जुबानी

कोलकाता से करीब 30 साल पहले आए। पिता रेलवे में थे यहीं मकान में रहते थे। समय का चक्र ऐसा घूमा कि अब न माता पिता हैं न परिवार। रिश्तेदार कोलकाता में रहते हैं कभी कोई बात हो गई तो ठीक। यहां दैनिक मजदूरी करते हैं रात्रि रैन बसरे में गुजार लेते हैं।अनूप चक्रवर्ती, कोलकाता

सब्जी का ठेला लगाता हूं। परिवार पाली में रहता है। एक पुत्री है। सब्जी बेचकर शाम को जो थोड़ा बहुत पैसे बचते हैं परिवार के लालन-पालन के लिए भेज देता हूं। रैन बसेरा ही आसरा है।

नारायण, पालीखुली मजदूरी करता हूं। पड़ाव में अनाज मंडी में काम मिल जाता है। परिवार से मिलने गांव आना-जाना होता था। यहां रैन बसेरे में सभी सुविधाएं हैं।

लज्जाराम बसई, धौलपुर

रैन बसेरे में गुजारा होता है। कहीं न कहीं रोजनदारी पर काम चल जाता है। यहां कोई परेशानी नहीं है। प्रसाधन भी साफ सुथरे हैं। सफाई की अच्छी व्यवस्था है।चैनाराम, जालौर